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विजय शतक- दोहावली
brijesh के द्वारा भेजा गया। on Wednesday, August 11 @ 19:30:49 IST (48 बार पढा गया।)
News of society vijaymeenabcas writes "विजय शतक
प्रथम खंड -(भक्ति)
हरो हरि हिय की व्यथा, हमरी दीन दयाल ।
हरयो ही रह्यो हिय में सदा , मेरे नटवर लाल ॥1॥
भोले हो नंदलाल तुम , चले तारने मोय ।
मुझ कामी के काम से , किसे ना नफरत होय 2

"
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Padyatra for Kyara Dham from Garh (Bassi) Jaipur
brijesh के द्वारा भेजा गया। on Sunday, August 08 @ 22:04:08 IST (23 बार पढा गया।)
News of society RGGARH writes "Dear all,

The Padyatra from Vill-Garh, Teh-Bassi (Jaipur) is about to start from Sep,2010 onwards.
You are requested to join with all your family.

In this yatra, all the meena society gather & enjoy with Lord Bhomiya Maharaj."
(आगे पढें... | 572 bytes more | टिप्पणियां? | प्राप्तांक: 5)


kahani- siskiya- remaining part 3
brijesh के द्वारा भेजा गया। on Monday, July 26 @ 20:59:57 IST (60 बार पढा गया।)
News of society Anonymous writes "kahani siskiya ka antim bhag prastut hai -part 3

कथा साहित्य

विजय सिंह मीणा

सिसकियाँ -3
जेठ की दामी तिथि का दिन. सूर्य की प्रचंडता सुबह से ही बढ़ रही थी. गाँव के चारों ओर खाली खेतों पर सूर्य की गरम किरणों का साम्राज्य था. अधिकतर लोग इन दिनों में अपने छप्पर य नीम, पीपल के पेड़ के नीचे खाट डालकर दुपहरी काटते हैं. इन दिनों में गाँव वाले पूरी तरह खाली होते हैं. फसल बैसाख से ही तैयार हो जाती है. इसीलिए गाँववाले इस मौसम में ही शादी ब्याह करते हैं. आज मगनी का ब्याह है. हरिया के नीम के नीचे हलवाई बरात के लिए लड्डू, जलेबी बना रहा है. सभी रिश्तेदार बरात की तैयारी के लिए भागा दौड़ी कर रहे हैं. औरतें ऊँचे स्वर में गीत गा रही हैं. मगनी उनमने मन से अपने हाथों में लगी मेंहदी को सुखा रही है. इतने में रामकली उधर आ गई. उसने मगनी की सहेलियों से कहा -
'बारात आने का समय हो गया है.'

"
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kahani- siskiya- remaining part
brijesh के द्वारा भेजा गया। on Friday, July 23 @ 18:38:45 IST (61 बार पढा गया।)
News of society Anonymous writes "

कथा साहित्य

विजय सिंह मीणा

सिसकियाँ - 2

siskiya part 2-
रामकली ने मुझे अपना सब कुछ दिया लेकिन मैंने सिर्फ दुखों के अलावा उसे दिया ही क्या है? मैं सदा ही उसके रूप को प्यार करता था. मुझे बहुत जोश आता था, मैं उससे गुस्सा भी हो जाता था, पर उसे पास देखकर मैं जानवर का बच्चा सरीखा बन जाता था. मैं उसके बदन को देर तक सहलाता था. वह ऐसे हँसती थी जैसे उसकी खूबसूरती की ताकत उसे मालूम थी. उन दिनों मैं कटीला जवान था. मेरे बालों में सुगंधित तेल पड़ता था. सफेद कुर्ता और दुलंगी धोती मेरे व्यक्तित्व को असाधारण बना देती थी. मैं ताकत वर था, मुझे उसकी हमेशा चाहना रहती थी. मेरी सारी आग उसे छूकर बुझ जाती थी. इन्हीं विचारों में खोये हुए हरिया को पता ही नहीं चला कि कब सवेरा हो गया?"
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hindi kahani -siskiyan
brijesh के द्वारा भेजा गया। on Thursday, July 22 @ 18:52:39 IST (63 बार पढा गया।)
News of society vijaymeenabcas writes "meri yah kahani kai pratisthit patrikao me chhapi thi .kripaya padhakar pratikriya bheje.

कथा साहित्य

विजय सिंह मीणा

सिसकियाँ

अरावली शृंखला की उपत्यका में बसा यह यह गाँव ढाई तीन सौ घरों की एक खुशहाल बस्ती है. पश्चिम की और अरावली की उन्मुक्त एवं रमणीक पहाड़ियाँ अपने पूरे यौवन का आनंद बिखेर रहीं हैं. यहाँ की भूमि उपजाऊ है. इस गाँव में अधिकतर परिवार कृषि पर निर्भर हैं. भरपूर फसल होने के कारण यहाँ के अधिकतर किसान ठीक ठाक स्थिति में हैं. गाँव के ठीक पश्चिम में एक घर जिसमें तीन प्राणी रहते हैं. यह घर भरोसी का है जो सीधा साधा और दुनियादारी से बहुत दूर अपने आप में ही मगन रहता है. इसकी पत्नी रामकली, जो हाल ही में नवविवाहिता के रूप में इस घर की सदस्या बनी है. इनके अलावा इनके छोटे भाई हरिया राम जो कि हमेशा ही दन्द-फन्द की चोपड़ रचते रहते हैं. ये गाँव में जब तक दो चार लोगों से उल्टी सीधी नहीं भिड़ते तब तक इनका खाना हजम होना मुश्किल है.
"
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