आरक्षण (प्रतिनिधित्व) के मूल अधिकार का औचित्य क्या है?

मैं वंचित वर्गों (अजजा) में शामिल हूं। करीब 21 वर्ष सरकारी सेवा में रहकर मैंने 2010 में स्वैच्छिक सेवानिवृति प्राप्त कर ली। कर्मचारी संगठनों सहित वंचित वर्ग के अनेक संगठनों का प्रतिनिधित्व किया और अभी भी हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन का राष्ट्रीय प्रमुख हूं। लम्बे समय तक लेखन एवं पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं। जिसके लिये राष्ट्रीय (2011) और अन्तराष्ट्रीय (2013) स्तर पर सम्मानों से विभूषित भी किया जा चुका हूं। मुझे प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया के मार्फत अपने विचार रखने के अवसर मिले हैं। देश के अनेक ख्यात पत्रकारों, लेखकों और समाज सुधारकों से मुझे बहुत कुछ सीखने और जानने के सुअवसर मिले हैं। एक दर्जन से अधिक पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों, पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व राज्यपालों और अनेक पदस्थ मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों सहित सैकड़ों सांसदों, विधायकों से अनेकानेक विषयों पर अनौपचारिक चर्चा करने के अवसर मिले हैं। पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र राज्यों में 70 से अधिक कार्यशलाओं या सभाओं में मुख्य/प्रमुख वक्ता के रूप में सिरकत करने का अवसर मिला। 1982 से 1986 के दौरान 4 साल 2 माह 26 दिन जयपुर के केन्द्रीय कारागृह सहित 4 जेलों में गुजारे। जहां पर भारत के अनेक प्रांतों और विश्व के अनेक देशों के कैदियों से अनौपचारिक साक्षात्कार करने का अवसर मिला। इस दौरान मिले अनुभवों का आज तक निचोड़ इस प्रकार है:-
1-मेरे प्रेरणा स्रोत: अनेक वैचारिक असहमतियों के बावजूद भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. बी. आर. अम्बेड़करजी और आधुनिक भारत के सामाजिक न्याय के मसीहा कांशीराम जी मेरे लिये प्रेरणा स्रोत हैं।
2-इरादतन विभेद और नाइंसाफी: कारागृह और न्यायालय सहित ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां पर MOST/वंचित वर्ग के लोगों तथा सभी वर्गों की महिलाओं के साथ इरादतन विभेद और नाइंसाफी नहीं की जाती हो।
3-निकम्मे और स्वार्थी लोगों पर संविधान मौन: विभेद और नाइंसाफी को समाप्त करने के लिये संविधान में वंचित वर्गों के बड़े हिस्से (अजा, अजजा एवं ओबीसी) को निर्धारित योग्यताओं में छूट प्रदान करके अपने वर्गों का प्रशासन में प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु सरकारी सेवाओं में प्रवेश का अवसर प्रदान किया गया। जिनमें से 99 फीसदी से अधिक संविधान के प्रावधानों के अनुसार वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व तथा अपने ही लोगों के हकों का संरक्षण नहीं करते हैं। ऐसे निकम्मे और स्वार्थी लोगों पर संविधान पूरी तरह से मौन है।
4-जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध संविधान अगले 5 साल तक मौन: राजनैतिक दलों के टिकिट पर सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से वंचित वर्गों के हितार्थ चुनकर संसद, विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों में जाने वाले जनप्रतिनिधि अपने-अपने दलों की नीतियों और हाई कमानों की इच्छा के बिना, अपने वर्गों के हित में एक शब्द भी बोलने की स्थिति में नहीं होते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध जनता के हकों की रक्षा के मामले में संविधान अगले 5 साल तक पूरी तरह मौन रहता है।
6-प्रमुख पदों पर पदस्थ होने का औचित्य: वंचित वर्गों के अनेक राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, आयोग अध्यक्ष, विभाग प्रमुख पदस्थ रहे हैं, लेकिन उनकी ओर से भी संविधान की भावनानुकूल अपने वर्गों के हितार्थ कानून और नीतिगत स्तर पर कोई स्थायी कदम नहीं उठाया गया। ऐसे में उनके होने या नहीं होने का औचित्य क्या रह जाता है?
6-नीति-निर्धारक पदों पर जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं: राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, विभिन्न आयोंग-अध्यक्षों, हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, मंत्रालय-सचिवों आदि नीति-निर्धारक तथा इंसाफ एवं संरक्षण प्रदान करने वाले पदों पर अजा, अजजा एवं ओबीसी वर्गों के लोगों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिये जाने का कोई बाध्यकारी संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
7-आरक्षण का विरोध एवं क्रीमी लेयर की मांग: बिन्दु 1 से 6 में वर्णित दु:खद और अफसोसनाक हालातों के होते/रहते हुए अनारक्षित वर्गों की ओर से वंचित वर्गों को प्राप्त उक्त कथित आरक्षण (प्रतिनिधित्व के संवैधानिक हक) के विरुद्ध लगातार विरोधात्मक आवाज उठायी जाती रहती है। जिसके कारण समाज में अनेक प्रकार की विद्रूपताएं उत्पन्न होती रहती हैं। जबकि वंचित वर्गों के वंचित लोगों को हर दिन कदम-कदम पर विभेद, नाइंसाफी, हिंसा और अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध क्रीमी लेयर की मांग भी उठती रहती है। यद्यपित क्रीमी लेयर भी मूल समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नयी बीमारी को जन्म देना है।

उपरोक्त हालातों में, मैं लगातार अपने आप से पिछले लम्बे समय से यह सवाल पूछता रहा हूं कि सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व हेतु निर्धारित योग्यताओं में छूट प्रदान करके नियुक्ति पदान करने और सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से जनप्रतिनिधियों को विधायिका में वंचित वर्गों के लोगों को भेजने के संवैधानिक प्रावधान का औचित्य क्या है?

मुझे लगता है कि जब तक इस सवाल का संवैधानिक समाधान नहीं निकलेगा, उक्त कथित आरक्षण का होना न होना संवैधानिक लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निरर्थक ही सिद्ध होता रहेगा। अत: मेरी राय में सबसे पहले इस विषय पर भारत की 90 फीसदी वंचित आबादी के हितार्थ भारत के विधिवेत्ताओं और संविधानविदों को अपूर्वाग्रही गहन विमर्श करके संवैधानिक समाधान निकालना होगा।

कम से कम वंचित वर्ग के बुद्धिजीवियों को इस विषय की गम्भीरता को रेखांकित करके, इसके समाधान के लिये योजनाबद्ध कार्य करना होगा।

—–>>>> *जय भारत! जय संविधान! नर-नारी सब एक सामान!*
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
Mobile No.: 9875066111 *(10 AM to 10 PM)*

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