यदि ये सरकार वास्तविक रूप से दलित हितेषी हैं, तो आरक्षण पर विधेयक क्यों नही लेकर आती ?

यदि ये सरकार वास्तविक रूप से दलित हितेषी हैं, तो आरक्षण पर विधेयक क्यों नही लेकर आती ?

‘जागरण विमर्श’ में 9 अप्रैल 2018 को पत्रकारों से कही बातों का सार
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इस लोकतंत्र और व्‍यवस्‍था में देश के दलित-आदिवासियों की आस्‍था बनाए रखने के लिए न्‍याय के हक में सरकार को तुरंत अध्‍यादेश लाकर SC-ST एक्‍ट को बचाना चाहिए. दलितों-आदिवासियों का उत्‍पी‍ड़न एक सामाजिक सच है.

आंकड़ों के मुताबिक हर एक घंटे में 15 दलित उत्‍पीड़न के शिकार होते हैं, हर दिन 6 दलित महिलाओं का बलात्‍कार होता है और 2 दलितों की हत्‍या.

संविधान सभा और संसद ने वंचितों के हक में जो प्रावधान किये हैं, उनको बचाने की जिम्‍मेदारी सिर्फ दलितों की नहीं, बल्कि सभी की. एक समतामूलक सभ्‍य समाज बनाने की जिम्‍मेदारी हर किसी की.
न्‍यायपालिका की जिम्‍मेदारी उन कानूनों की सही व्‍याख्‍या और उन्‍हें लागू करवाने की है, न कि उन्‍हें कमजोर कर देने की.

अगर कोई मिसयूज करता है तो उसे सजा दीजिए, लेकिन एक्‍ट से छेड़छाड़ मत कीजिए. लोकतंत्र को अगर भ्रष्‍ट और अपराधी नेताओं ने मिसयूज किया है तो हम ये थोड़े ही कहेंगे कि लोकतंत्र को खत्‍म कर देना चाहिए, बल्कि हम ये कहेंगे कि भ्रष्‍ट और अपराधी नेताओं को सजा मिले.

सरकार की उदासीनता की वजह से ये हालात बने हैं. तमाम क्षेत्रों में दलितों-आदिवासियों का प्रतिनिधित्‍व सुनिश्चित करना चाहिए. उसी से वे ताकतवर होंगे. न्‍यायपालिका को आसान व सस्‍ता बनाना चाहिए. उसमें भी सभी तबकों को प्रतिनिधित्‍व सुनिश्चित हो.

2 अप्रैल के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसका बिना किसी पार्टी या नेता के होना है. आंदोलन की सफलता की वजह से सब उसको भुनाना चाहते हैं. अब नेताओं को समझ लेना चाहिए कि दलित अब किसी के वोट बैंक नहीं. अपना फैसला खुद लेने में सक्षम.

बाबासाहब अंबेडकर या दलितों से हमदर्दी जतानी है तो 2 अप्रैल के आंदोलन में फर्जी मुकदमों में जेलों में बंद कर दिये गए युवाओं को छुड़ाने की कोशिश कीजिए.
किसी उच्‍च न्‍यायालय के रिटायर्ड जज की निगरानी में एक फैक्‍ट फाइंडिंग टीम बनाइए कि कितने दलित युवकों को कहां-कहां फंसाया गया है.

SC-ST एक्‍ट होने पर भी दलितों के प्रति किये गए अपराध के मामलों में कन्विक्‍शन नहीं हो पाने के कारणों की भी जांच होनी चाहिए. केस दर्ज न करने या केस वापस लेने के लिए दलितों के ऊपर पड़ने वाले विभिन्‍न सामाजिक दबावों से उन्‍हें बचाने की कोशिश होनी चाहिए.

दलितों को शिक्षा और नौकरियों में आने से रोकने के लिए लाए जा रहे नए रोस्‍टर, स्‍वायत्‍तता, निजीकरण आदि प्रावधानों को भी रोकना चाहिए.

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