क्या हुक्का पाणी बंद करने की व्यवस्था ही सही थी ?

मेरे विचार से गावों मे प्राचीनकाल में पंचो द्वारा हुक्का पाणी बंद करना वर्तमान कानूनी व्यवस्था से अधिक कारगर व्यवस्था थी।

किसी गंभीर अपराध जैसे गो हत्या में अपराधी का हुक्का पाणी बंद करने वाली ग्रामीण पंचों की दंड व्यवस्था अपराध रोकने के मामलें में बहुत ही कारगर व्यवस्था थी।

हुक्का पाणी बंद करने के बाद अपराधी का हर पल बडी बैचैनी में गुजरता था।एक तरह से उसे असामाजिक प्राणी प्राणी करार दे दिया जाता था।रह रह कर उसे अपने पाप पर प्रायश्चित होता था।
साथ ही त्वरित न्याय भी मिल जाता था।

इसके विपरीत वर्तमान कानूनी व्यवस्था एक तो बहुत खर्चीली है।ज्यादातर मामलों में काले कोट वाले खूब लूटते है।खाकी वाले भी खूब लूटते है। दूसरे अपराधी जेल से छूट जाने पर बाहर आकर पुनः अपराध करता है। अंदर बाहर होने का सिलसिला उस अपराधी के लिए आम होता है।यह बात भी है कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में फैसले भी देरी से आते है।

जेल भेजने के बजाय सरकार स्वयं हुक्का पाणी बंद करने की व्यवस्था लागू करदे तो अपराधों में कमी आ सकती हैं।

किन अपराधों में सरकार अपराधी नागरिक का हुक्का पाणी कर सकती है?

  • 1)भ्रष्टाचार,रिश्वतखोरी
  • 2)दहेज लेना एवं देना।
  • 3)चोरी, डकैती,बलात्कार
  • 4)ड्रग्स का सेवन
  • 5)तस्करी
  • 6)धोखा धडी आदि।

सरकार हुक्का पाणी बंद कैसे कर सकती है?
सरकार निम्नलिखित उपाय कर सकती है।

  • 1)सभी सरकारी सुविधाओं से अपराधी को वंचित किया जा सकता है।
  • 2)अपराधी के परिवार को भी वंचित किया जा सकता है।
  • 3)सरकारी नौकरी प्राप्त करने से रोका जा सकता है।
  • 4)दोष सिद्ध रिश्वतखोर अफसरों की आने वाली पीढ़ी को सरकारी नौकरी प्राप्त करने से वंचित किया जा सकता है।

क्या वर्तमान समय और परिस्थितियों में ये प्राचीन न्याय व्यवस्था लागू कर पाना तर्कसंगत रहेगा और क्या आधुनिक युगों की सरकारों के लिए ये लागू कर पाना संभव हो पायेगा !!

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