आ मेरे आगोश में तुझे सब कुछ सिखा दूं, तेरी टांट मे जितने बाल हैं वो भी झडा दूं – शायर रामजीलाल जुल्मी

 आ मेरे आगोश में तुझे सब कुछ सिखा दूं, तेरी टांट मे जितने बाल हैं वो भी झडा दूं – शायर रामजीलाल जुल्मी

मेरे बचपन के संस्मरण 

बात उन दिनों की है जब हम हायर सैकेन्ड्री में तहसीली कस्बे में पढते थे । मेरा एक मित्र था रामजीलाल । अपनी धुन का पक्का , कुछ अलग करने और कुछ अलग ढंग से जीने मे विश्वास रखने वाला । पढने में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी । घरवालों के दबाव में वो स्कूल आना अपनी मजबूरी समझता था ।

एक रोज जब वह स्कूल आ रहा था तो रास्ते में एक ट्रक पर नजर पड गई । ट्रक पर एक शेर लिखा हुआ था –

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ,

ना जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ।

बशीर बद्र के इस शेर ने न जाने उसके दिलोदिमाग पर क्या जादू किया कि उसने शायर बनने की भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली । उस दिन के बाद से ही वो सारे ट्रकों को अपना गुरु मानने लग गया और जहां भी ट्रक दिखा , कान पकड कर सिर झुका देता ।

अब वो रोज कोई न कोई तुकबन्दी करके लाता और स्कूल में आकर मुझे सुनाता । मैं भी उनका हौंसला बढाता और शेर के मुकाबले मे सौ गुनी दाद देता । उन्हीं दिनो पाठ्यक्रम मे कबीर , तुलसी , रहीम आदि को पढ पढकर मुझे भी दोहे लिखने का अद्भुत शौक लगा हुआ था । मैं भी अपने दोहे उसे सुनाता लेकिन वो मेरे मुकबले कम दाद देता और सिर्फ यही कहता …’’ लगे रहो तुम दोहाकार बन सकते हो ।‘’

राजस्थानी पशुपालकों के साथ

एक दिन रामजीलाल कही से आठ आने में एक छोटी सी पुस्तिका खरीद लाया जिसमे रोजमर्रा के उर्दू शब्द और उनका हिन्दी अनुवाद था । उसने वो पुस्तिका रट ली और व्यवहार मे उन शब्दो का मुक्त रुप से प्रयोग करने लगा । जनाबे आली , तशरीफ रखिए , माशा अल्लाह , खुदा खैर करे जैसे शब्द बात बात में उसकी जबान से टपकने लगे । इस कारण कुछ लोग उन्हे चिढाने के लिए उन्हें पाकिस्तानी तक कह देते लेकिन वो उन लोगो पर ध्यान नहीं देता और सिर्फ इतना ही कहता ..’’ये तुम्हारा कसूर नहीं है , खुदा ने तुम्हे इतनी ही अक्ल दी है ।‘’

एक रोज रेस्ट में उन्होंने अपना एक शेर मुझे सुनाया –

बादलों के बीच में रहता मेरा खुदा ,

बदजात तू क्या ढूंढता है सडक किनारे ।

सुनकर मुझे हंसी आई लेकिन मै हंसी को पी गया और मैने कहा ..’’ जुल्म ढा दिया आज तो रामजीलाल , क्या गजब शेर कहा है ।‘’

सुनकर रामजीलाल के दिमाग मे एक विचार कौंधा और उसी क्षण से उसने अपना शायराना नाम रख लिया – रामजी लाल ‘ जुल्मी’। मैने भी इस नाम पर सहमति दी ।

उसका ये शायरी प्रेम इतना बढ गया कि कोई जब उनके शेर नहीं सुनता तो वो दीवारो पर ही लिखने लग गया ।एक दीवार पर उसने लिखा –

आ मेरे आगोश में जन्नत दिखा दूं,

दिल चीरकर मैं अपने जज्बात दिखा दूं।

मैंने वो शेर पढा और दिमाग में एक शरारत सूझी । मैने ठीक उस शेर के नीचे उसे चिढाने के लिए कुछ लाईने बनाकर लिख दी-

निकम्मों की बस्ती में जन्नत नहीं मिलती ,

शायर की पूछ गन्दगी करने तुझे दिवार ही दिखती ।

आ मेरे आगोश में तुझे सब कुछ सिखा दूं,

तेरी टांट मे जितने बाल हैं वो भी झडा दूं।

‘ शायर तेरा बाप’

दूसरे दिन रामजीलाल ने ये लाईने पढी और गुस्से से आग बबूला हो गया । मन ही मन गालियों का अम्बार लगाता रहा और आखिर में अपने गुस्से को दिवार पर कुछ युं उकेर दिया-

आ मेरे दिवाने तुझे बाप बना दूं,

गदहे की तरह तुझको भी बेसींग बना दूं।

तेरी तमन्ना एक दिन पूरी करुंगा मै,

दफनाके तुझे कब्र में मिट्टी भरूंगा मैं।

(‘ तेरा असली बाप रामजी लाल ‘ जुल्मी’)

हमारा इस तरह ये भीत युद्द काफी दिनों तक चलता रहा । वो रोज मुझसे जिक्र करता कि बस एक बार मेरे हत्थे चढ जाए वो बाप फिर उसे जहन्नुम में ना पहुंचादू तो मेरा नाम जुल्मी नहीं । मै उसे समझाता कि ऐसे लोगो पर गुस्सा नहीं करना चाहिए । कोई आपका अपना ही होगा जो आपको इस तरह चुनौती देकर और अच्छी शायरी लिखने के लिए मजबूर कर रहा होगा ।

शायरी का उसका भूत दिनो दिन बढता जा रहा था । परीक्षाए भी नजदीक आ रही थी और जब हम उसे पढने के लिए कहते तो उसका जवाब ऐसे होता –‘’ कबीर , तुलसी , सूर के पास कौनसी डिग्री थी ?’’

सुनकर हम भी निरुत्तर हो जाते ।

घर में भी वो अकेले में अपने शेरो को गुनगुनाता रहता । इस बात से उसके मां बाप बहुत चिन्तित थे और उन्होंने कयास लगाया कि लडके के सिर कोई भूत प्रेत का साया है । इसी आशंका के चलते एक रोज रामजी लाल को जबरदस्ती एक मौलवी के पास ले जाया गया जो कुछ झाड फूंक करता था ।

मौलवी ने पूछा क्या करते हो ? रामजीलाल ने एक शेर वहां भी दे मारा –

मैं तो खुदा की इबादत करता हूं मौलवी ,

तेरा इलाज करने मैं खुद चला आया ।

सुनकर मौलवी अपने होंठो में बुदबुदाता रहा और बोला – इस लडके के कसाई का साया है । बहुत खतरनाक है तभी उर्दू मे बात करता है । मै ताबीज बना देता हूं । 

मौलवी ने कुछ झाडफूंक की , कुछ सामग्री और लोह सिंघाण को आग के हवाले किया और खप्पर को दो तीन बार रामजी लाल के सिर पर फेरा । रामजी लाल बोला कि अंधविश्वासी मौलवी इनसे मेरे कुछ नहीं होने वाला । पहले तुम अपना इलाज करवाओ किसी पागलखाने जाकर ।

जबरदस्ती रामजीलाल के गले और बाजुओ मे ताबीज बांध दिए गए ।

रामजीलाल अपने पथ पर चलता रहा । अब और भी ज्यादा देर तक जंगल मे एकांत किसी पेड के नीचे घंटो अपने शेरो को गुनगुनाता और लिखता रहता । परीक्षाए भी दी लेकिन वो फेल हो गया । ऐसे हालात को देखते हुए घरवालो ने उसकी जबरदस्ती शादी करदी ये सोचकर कि शायद गृहस्ती मे पडने पर कुछ सुधार हो ।

उसके बाद मैं शहर चला गया और मेरी नौकरी लग गई । उनसे लम्बे अर्से तक मुलाकात नहीं हुई ।

पिछले दिनो जब मैं गांव गया तो कस्बे में अचानक एक व्यक्ति दिखाई दिया जिसकी संत नुमा दाढी बढी हुई थी , सिर के अधिकांश बाल सफेद हो गये थे और आंखे भी धंसी हुई थी और उम्र से पहले वृद्ध सा दिखाई दे रहा था ।मैने उसे गौर से देखा और उसकी भी मुझ पर नजर पड गई । तस्वीर कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी । मैने कहा रामजीलाल ?

वो मेरे गले से लिपट गया और आद्र स्वर में कहां …हां विजय भाई ।

तीन दसक के लम्बे अर्से के बाद हम मिले थे । दोनो भावुक हो गये और स्वर भी दोनो का कम्पन्न करने लगा ।

पास में ही एक चाय की थडी थी हम वहां बैठ गये और घर गृहस्थी की बातें करने लगे । उन्होने बताया कि उन्होने बडी पुत्री की शादी करदी और लडका भी रेल्वे मे नौकरी लग गया है । बातों के सिलसिले में मैने उनके लहजे में एक खास तब्दीली देखी कि उर्दू का कोई शब्द वे प्रयोग नहीं कर रहे थे और माया , संसार , ब्रह्म , प्रकृति और जीवन की निस्सारता जैसे दार्शनिक शब्द वे अधिक प्रयोग कर रहे थे । मैने पूछा कि भाई जुल्मी आपकी शायरी कैसी चल रही है ?

उन्होंने कहा कि जुल्मी को मरे हुए तीस साल हो गये , अब आपके सामने रामजीलाल ‘ निरंकारी ‘ बैठा है । मैने कहा ये कैसे ? आगे की कहानी रामजीलाल की जुबानी सुनिए-

‘’ जब घरवालो ने मेरी शादी करदी तब भी मै लगातार लिखता रहा और गृहस्थी मे बिल्कुल भी मन नहीं लगता था । बस शायरी ही मेरा संसार था । एक रोज कस्बे मे एक मुशायरा हुआ और मैंने वहा पहुंचकर बडे शायरो से मिन्नत की कि मुझे सिर्फ एक बार मौका दे मंच पर , मै भी शायर हूं। आयोजक ने बात मान ली और मुझे मौका दिया गया । मैने ज्योंही अपनी एक गजल सुनाई तो शायरो के साथ साथ श्रोता मेरी हूटिंग करने लगे । एक शायर ने कहा –लाहोल बिला कूबत , कैसे कैसे गंवार आ जाते है ? ना शायरी का कोई सऊर ना अक्ल ।

मैने उसी दिन जुल्मी को कब्र में दफना दिया और कबीर को पढने में मन लगा दिया । अब मैं निर्गुण के भजन लिखता हूं और और आस पास के सत्संगो मे लोग मुझे गाने के लिए बुलाते है । तब से ही मैने अपना नाम रामजी लाल निरंकारी रख लिया ।‘’

मैने उनसे आग्रह किया कि अपनी कोई रचना सुना दीजिए । उन्होंने अविलम्ब वहीं थडी पर तान छेड दी और एक उनका बनाया भजन सुनाया जिसे सुनकर मैं और वहां उपस्थित लोग भाव विभोर हो गए । उस भजन को यहां लिखना विषयानुकूल ही रहेगा —

—(जीवन का मर्म)—

1) भाई बन्धु और कुटुम कबीलो, कोई न आडो आवे,

चार आदमी का कांधा पै, साथ कछु नहीं जावे।

सुमरो हरिनाम अब भाई रे…… माया का चक्कर मे……..

2) जीव जगत का या चक्कर में, निशदिन धोखो खावे,

हरिनाम के सिवा भायला कछु ने आडो आवे।

करदी तैने जगत हंसाई रे…. माया का चक्कर में…..

3) भ्रम में चक्कर बहुत लगाया , हाथ कछु नहीं आयो,

मानुष देहि धारण को तू , मर्म समझ नहीं पायो,

कोरा धन में तेरी झ्याई रे… माया का चक्कर में…..

4) हंश उड्यो जब या काया को , झूठी दुनियां रोवे,

धरमी सचमुच पार उतर गया, पापी बैठ्या रोवें।

गूलर गोल समझ के खाई रे…माया का चक्कर में…

5) हरिनाम कु छोड जीव जब ओडो सोडो डोले,

माया ठगनी का पल्ला में बंध्यो बंध्यो वा डोले।

ह्रदय निरंकार के आई रे… माया का चक्कर में….

सुनकर चारों ओर चाय पीने वालो की वाह भाई वाह की ध्वनि गूंजने लगी । हम करीब तीन घंटे तक बचपन की स्मृतियों मे विचरते रहे । रामजीलाल ने अनायास पूछ लिया कि यार वो लडका कौन था जो मुझे चिढाने के लिए शेर लिखता था दिवार पर ? आज तक पता नहीं लगा । मैने तपाक से उत्तर दिया कि वो शायर बाप मै ही था । सुनकर दोनो देर तक ठाहके लगाते रहे ।

रामजीलाल ने मुझसे फरमाईस की कि तुम तो दिल्ली रहते हो मुझे निर्गुण साहित्य की अच्छी पुस्तके उपलब्ध करवाओ । मैने वादा किया और इस बार के विश्व पुस्तक मेले से उनके लिए बहुत सी पुस्तकें मैने खरीदी है । जल्दी ही गन्तव्य पर पहुंचा दूंगा ।

आज भी संस्मरण लिखते समय आंखे अनायास गीली हो गई ।

(  साभार मेरी आगामी कृति ” यादों में गांव ”—- विजय सिंह मीना , कवि एवम कथाकार )

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