फूट्या करम फकीर का भरी चिलम ढुल जाए- बचपन के किस्से, विजय सिंह जी के साथ

गांव मे एक घर फकीरों का था । गफूर चार भाईयों में सबसे छोटा था । तीन बडे भाईयो की शादी हो गई थी परन्तु गफूर का घर अभी तक नहीं बसा था । वो रोज सवेरे बाल्टी लेकर गांव में आटा मांगने जाता था । दिन में वो दिहाडी पर इधर उधर छोटा मोटा काम कर लेता था । इतना करने के बावजूद भी आए दिन उसकी भाभियां उस पर निठल्लेपन का ताना कसती रहती थी ।एक दिन तो गफूर को ऐसा गुस्सा आया कि उसने खुले शब्दो मे अपनी भाभी से कह दिया ..” अब तो या घर मे जभी घुसुंगो जब बैयरबानी लियांउगो।” कहकर वह गांव के पटैल के पास चला गया ।
गफूर— बाबा या बस्ती माता म्हारा बारे मे भी सोचेगी या नहीं।

पटैल- कांई होगो गफूर ? सुबह सुबह क्युं फूंफारोय।

गफूर- अब तो बाबा तेरो ही आसरो है या बस्ती में । दो हजार रुपया देदे बैयरबानी ल्याउंगो। मरतो जीतो चुका द्युंगो । याई बस्ती में रहणो है मोकु।

पटैल- रुप्या तो दे द्युंगो पण एक बात बता , बैरबानी का पेड के लटके जो जार लियावेगो ।

गफूर- बाबा मैने भरतपुर की तरफ एक जानकार सु बात कर राखी है । दो हजार मांग रोय ।

पटैल ने उसे दो हजार रुपया दे दिए और गफूर चला गया । दो दिन बाद सुबह 10 बजे के करीब गफूर एक सुन्दर बैयरबानी के साथ तांगे से गांव आया । हम स्कूल में कक्षा में बैठे उस आते हुए तांगे को उत्सुकता से देख रहे थे । गांव मे पहली बार कोई तांगा लेकर आया था । थोडी देर में गांव मे गफूर की बहु की चर्चा जोरो पर थी । औरते उसे देखने आती और देखती ही रह जाती ।उसकी कोई सी भी भाभी उसे देखने नही आई । हम भी रेस्ट के समय वहां गए । वाकई सुन्दरता की प्रतिमूर्ति थी वह । 

उसी दिन दोपहर बाद हमारे स्कूल के ग्राउंड मे एक साइकिल पर करतब दिखाने वाले कलाकार ने डेरा जमाया और फिल्मी धुनो के साथ साईकिल पर करतब दिखाने लगा । सारा गांव इकट्ठा हो गया । गफूर भी अपनी नई नवेली दुल्हन को तमाशा दिखाने लाया । उस समय उस कलाकार ने गाना बजाया —- तेरे दर पै आया हूं , कुछ करके जाउंगा, झोली भरके जाउंगा या मरके जाउंगा……

गाने की धुन पर कलाकार साइकिल पर डांस कर रहा था । गफूर ने खुश होकर उसे एक रुपया दिया और खुद भी उस गाने पर भांडी तोडने लगा । उसकी नवेली दुल्हन ने घूंघट से पहले तो साइकिल वाले को देखा और फिर एक रुपया गफूर के सिर पर उसारकर कलाकार को दे दिया । शाम पांच बजे तक यह खेल चला उसके बाद लोग अपने घरो को लोट आए । गफूर भी सपत्नीक वापिस आ गया ।

गफूर के कच्चे छप्पर से दोनो की खिलखिलाहट और हंसी ठट्टे की आवाज उसकी भाभियो के कानो जहर घोर रही थी । गफूर अपनी पत्नी को मिठाई खिलाते हुए कह रहा था ,,,,,” ले मिठाई खा , अब तक तो मैने कमा कमा कर कुत्तो को ही खिलाया है ।” इस बात को सुनकर बगल की बाखड से उसकी भाभी की गालियो की आवाज आने लगी ।…” नासपीटे , तेरो पैदो भी तो अब तक हमीने भरयो है ।”

थोडी देर बाद ही गफूर की घरवाली के गाने की आवाज आने लगी…मेरो राजा जलेबी को टूक मै मिसरी की डली।” इनकी आवाज को सुनकर भाभिया जली भुनी जा रही थी ।

शाम को गफूर की पत्नी ने खाना बनाया और गफूर को परोस दिया । खाना खाते ही न जाने क्या हुआ कि गफूर को खाट पर बैठते ही नींद आ गई । सुबह 7 बजे गफूर की नींद खुली , सिर भारी हो रहा था । उसने चारो ओर देखा लेकिन उसकी पत्नी नजर नही आई । साथ मे जो लत्ते कपडे का बक्सा लाई थी वह भी गायब था । उधर स्कूल से करतब दिखाने वाला भी गायब था । अनायास ही वह कहावत चरितार्थ हो गई कि फूटया करम फकीर का भरी चिलम धुल जाए ।

दर असल वह एक गिरोह था जो इसी प्रकार पैसे लेकर लडकिया भेज देता और शाम को करतब दिखाने के बहाने उसी गांव मे डेरा डाल देता और रात को लडकी को लेकर फरार हो जाता । गफूर उसी का शिकार हो गया था । उसकी भाभी भी ताने मार रही थी … अब कहां गई तेरी मिसरी की डली ? हमारी होड करेगो नांगतणा को ।”

अब सुबह जब गफूर आटा मांगने गांव मे जाता तो बच्चे उसे देखते ही ये गाना गाते ….तेरे दर पै आया हूं …सुनते ही गफूर आगबबूला हो जाता और भद्दी भद्दी गालिया निकालता ।

( साभार विजय सिंह मीणा की यादों में गांव किताब से)

Facebook Comments

Leave a comment