बच्चें देश का भविष्य होते हैं, लेकिन भुखें बच्चें और बदहाल आंगनबाड़ियों के बलबूते कैसे बनेगा सशक्त भारत

बच्चें देश का भविष्य होते हैं, लेकिन भुखें बच्चें और बदहाल आंगनबाड़ियों के बलबूते कैसे बनेगा सशक्त भारत

आंगनबाडी (समेकित बाल विकास सेवायें ) (Integrated Child Development Services) कितना सफल कितना असफल । 

हमारे देश को आजाद हुये लगभग 70 वर्ष हो गये । अंग्रेजों के गुलामी से  तो यह देश आजाद हो गया लेकिन आज भी इस देश के लोग भूख और गरीबी से लड़ रहा है । गरीबी और भूखमरी इस देश की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है ।हम यह कहते हुये थकते नहीं की इन सत्तर वर्षों में देश का चहुमुखी विकास हुआ । देश में हरित क्रांति से  कई राज्यों का विकास हुआ । देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई । आज भारत नई तकनीकी का प्रयोग कर  प्रगतिशील देश के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है । लेकिन इस कटु सत्य को भी स्वीकारना होगा की कहीं ना कहीं विकास के इस दौड़ में देश के  कुछ राज्य के लोग अभाव और आर्थिक संकट से गुजर रही है । 

विश्व स्वास्थ्य संगठन  द्वारा  वर्ष 2015 के  एक रिपोर्ट के  मुताबिक पूरे दुनिया में 5 से 6 वर्ष के उम्र के लगभग 60 लाख बच्चे की मृत्यु कुपोषण से हुई । उनमें से ज्यादातर बच्चे भारत के  45% ग्रामीण और आदिवासी इलाके के बच्चे थे जिनकी मृत्यु का कारण कुपोषण था । 

अगर हम भारत के आदिवासी इलाके की बात करें तो इस क्षेत्रों में कुपोषण और इससे जुड़े कई समस्याओं को रोकने के लिये कई सरकारी योजनायें चल रही है । जिनसे से एक बहुत ही महत्वपूर्ण योजना है  ‘ आंगनबाड़ी ‘  का है  । 

1975 में ‘ समेकित बाल विकास योजना ‘ ICDS की शुरुवात हुई थी । जिसे ‘ आंगनबाड़ी ‘ के नाम से भी जाना जाता है । 

” बच्चे देश का भविष्य होते है । लेकिन भूखे एवम कुपोषित बच्चों के दम पर एक मजबूत ‘ राष्ट्र ‘ का निर्माण सम्भव नहीं है ।”  

इसी को ध्यान में रखकर ‘ भारत सरकार’  ने 02 अक्टूबर 1975 को ‘ समेकित बाल विकास योजना ‘ की शुरुवात की थी । आज इस देश में आंतरिक क्षेत्रों के ग्रामीण इलाके में कोई सरकारी , राजनीतिक या सामाजिक  प्रतिनिधि आपको मिले या ना मिले लेकिन   ‘आंगनबाड़ी केंद्र ‘ आपको जरूर मिलेंगे । आंगनबाड़ी का संचालन एक संचालिका और एक सहायिका के हाथों में देश का भविष्य  होता है लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण इस प्रकार की योजनायें अभी भी अपने लक्ष्य से कोसों दूर है । 
लगभग चालीस वर्षों से ‘आंगनबाड़ी’  यानी ‘ समेकित बाल विकास सेवायें ‘ ने कई उतार चढ़ाव देखें है । अनेक रिपोर्ट में इस योजनाओं की तारीफ हुई तो वही कुछ सरकारी रिपोर्ट में बच्चों में होने वाले कुपोषण को रोकने में पूरी तरह से नाकाम बताया गया । 
मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के ‘ कुरकू ‘ जनजाति क्षेत्र में वर्ष 2010 में बड़ी संख्या में छोटे बच्चों की मौत कुपोषण से हुई । ग्रामीण लोगों का मानना था की यह मौत किसी ‘ दैवीय प्रकोप ‘ के कारण हुई । लेकिन जब आंगनबाड़ी के कुछ सुपरवाइज़र  ने ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर इन मौतो की जांच की तो पता चला की उन गांवों में ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी । उन गांवों के किसी भी घरों में 1 या 2 किलो से ज्यादा अनाज नहीं पाये गये । उन ‘ कुरकू ‘ जनजाति बहुल क्षेत्र में बच्चों के मौत से सरकार ने महिला और बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से इन क्षेत्रों में युद्ध स्तर से कार्य शुरू किया गया । 
राष्ट्रीय स्तर पर अगर देखें तो ‘ आंगनबाड़ी ‘ की स्थिति बहुत बेहतर दिखती है । एक ‘ आंगनबाड़ी ‘ में 0 से 5 वर्ष के 35 बच्चे और 3 से 6 वर्ष के 29 बच्चे होते है । सरकार की गाइडलाइन में प्रतेक आंगनबाड़ी में 40 बच्चों की बात की गई है पर मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के ‘ कुरकु जनजातियों ‘ की स्थिति बदहाल नजर आती है । 

सांवलीखेड़ा के एक  आंगनबाड़ी सूपरवायजर निर्मला कर्मा  के मुताबिक उनके अंडर 24 आंगनबाड़ी है । हर आंगनबाड़ी में बच्चों की संख्या 100 से भी ज्यादा है । 
असल में ‘ समेकित बाल विकास योजना कार्यक्रम ‘  पूरी तरह से सफल नहीं होने का कारण स्पष्ठ है  । ICDS का बेहतर बदलाव तभी होगा जब एक आंगनबाड़ी में एक संचालिका और दो सहायिका को  नियुक्त किये जाय ।अक्सर देखा गया है की आंगनबाड़ी के संचालिका और सेविका कम पढ़े लिखे होते है या बिल्कुल ही अनपढ़ होते है  क्योंकि सारा काम एक ही कार्यकर्ता के ऊपर  निर्भर रहता है । पोलियो ड्रॉप , टीकाकरण , गर्भवती महिलाओं की जाँच , कुपोषित बच्चों को NRC केंद्र ले जाना ये सारे काम एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ही करती है । साथ ही साथ कुछ सरकारी डेटा को संग्रह करने की सारी जिम्मेवारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिया जाता है जो उचित नहीं है जैसे मतदान पत्र , आधारपत्र , जनगणना आदि जैसे कार्य राज्य सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से कराया जाता है जिससे उनके कार्य क्षमता में असर पड़ता है । जितनी उनकी तनख्वाह नहीं होती उससे ज्यादा उनसे कार्य कराये जाते है जो उचित नहीं । देश के कई राज्यों के  आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कुछ वर्षों से तनख्वाह बढ़ाने की मांग राज्य सरकार से कर रही है । उनकी शिकायत है की कई बार महीनों और सालों से उनको तनख्वाह  समय पर नहीं दिया जाता फिर कैसे ICDS सफल हो सकता है । 

इस तरह के हालात देखकर जमीनी हकीकत समझ में आती है की भारत के जनजाति क्षेत्र में बच्चों के कुपोषण के क्या कारण है इस लिये राज्य सरकार को इस तरह के कार्यक्रम में थोड़ा बदलाव करने की जरूरत है । 
– राजू मुर्मू

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