दाल में भैरण्ट करंट- साहित्यकार विजय मीणा का शानदार लेख

बात 1983 की  है जब मै पहली बार जयपुर रहने लगा । उन दिंनो बारात 2-3 दिन तक रुकती थी । ऐसी ही एक शादी में हम ( मैं और मेरे एक कजिन) हमारे मकान मालिक के लडके की बारात में टोंक के पास एक गांव में गए ।

 मकान मालिक के लडके ने पहली बीबी को छोड रखा था और ये चुपके से उसकी दूसरी शादी थी । दूल्हे घर से सादा कपडो मे ही निकला ताकि दूसरी पार्टी को कहीं ये शक न हो जाए कि कही से शादी कर रहा है । उस गांव से एक किमी पहले ही दूल्हे को नये कपडे पहनाए। गांव छोटा ही था और उसमे करीब उस सावे पर 15 अन्य बारात भी आई थी । उस गांव मे उस समय बारात का मैन्यु भी फिक्स था । लड्डु पहले ही दिन एक साथ बनवा लिए गए थे और तीन दिन तक उन्हे ही खिलाया जाना था । उसके साथ मोटी मोटी पूरी और दाल भी बनाई गई थी । शाम को बारात जीमने बैठी तो मेरी बगल मे दो बुजुर्ग से व्यक्ति बैठे थे । सबके आगे दो दो पत्तल डाली जा रही थी ताकि एक मे लड्डु पूरी और दूसरी मे दाल डाली जा सके । मेरे बगल में बैठे हुए दोनो बुजुर्ग व्यक्तियों ने जमीन खोदकर एक गड्डा बनाया जिसमे उन्होंने दाल के लिए पत्तल जमा दी ताकि एक साथ ही ज्यादा दाल ले सके । बगल वाला बुजुर्ग व्यक्ति मेरे से भी कहने लगा….” ऐंया जमा पातड ने, फेर ही ज्यादा दाड आवेली।”….. मैने कहा कि बाबा मैं तो कम ही खाता हूं , मेरे लिये तो बिना गड्डे ही बहुत है । 

इनके ग्रामीण पृष्टभूमि पर लिखे आलेख शानदार होते हैं

मेरी बात को सुनकर दोनो बुजुर्ग हंसने लगे और एक ने दूसरे से कहा …

.”’ देखले भाया रमस्या, या हाल च या नई औलादां को। याने याई सोदी कोनी कि दाल कैंया खाई जावे?” 

 कहकर दोनो मेरे उपर हंसने लगे । जब दाल परोसने वाला आया तो उस व्यक्ति ने कहा …” भाया फुल भरजा ।”….. परोसने वाले ने पत्तल को फुल भर दिया ।
 जैसे ही परोसगारी पूरी हुई तो वहां के एक बुजुर्ग ने जीमने का आदेश दिया। बगल में बैठे एक बुजुर्ग ने तो पहले लड्डु खाना प्रारम्भ किया परन्तु दूसरे बुजुर्ग ने पहले दाल में सबडका मारा । जैसे ही उसने दाल में हाथ डाला तो वह अपनी जगह से उछलकर चिल्लाता हुआ औंधा गिर गया और लगातार रोए जा रहा था….” अरे मोने बचाओ , मरग्यो ।” ….

उसके हाथ से फैली दाल के छेंटे मेरे कपडो पर भी गिर गए थे । माजरा कुछ समझ नही आ रहा था । सारी बारात एक दम से खडी हो गयी । वो बुजुर्ग लगातार चिल्लाए जा रहा था । उसकी इस हालत को देखकर कई लोग कहने लगे..”कोई उपली पराई को चक्कर है ।”

 दूसरा व्यक्ति कह रहा था …” मोकु तो इस्यो लागे च कि कोई औत परीत को चक्कर है । पातड पै ज्यादा परेसान करे ये अऊत परीत ।” … इतने मे ही तीसरा व्यक्ति कहने लगा..” कोई सांप सडुको घुसगो पंगत में , देखो अभी तो यही होगा।” लोग तरह तरह के कयास लगा रहे थे परन्तु उस बुजुर्ग से कोई नही पूछ रहा था कि क्या हुआ? आखिर मैने ही उससे पूछा कि बाबा क्या दिक्कत होगी? तो बाबा ने रोते रोते कहा …

” भाया या दाड के मायने करेन्ट आ रियो च। म्हाको हाथ सुन्न होगो ।” इतना सुनते ही भीड मे से एक नवयुवक ने अपने प्लस्टिक के जूते उतारे और उस बाबा के सारे शरीर पर जोर से जूतने मारने लगा । गांवो मे ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से करेन्ट का असर खत्म हो जाता है ।

 बात की गहराई पर जाने पर पता लगा कि जिस जगह उस बुजुर्ग ने पत्तल के लिए गड्डा बनाया था उसके नीचे अर्थ का नंगा तार जा रहा था और दाल से पानी रिस रिस कर वह जगह गीली होने से उसमें करेन्ट आ गया ।

अगले दिन सुबह एक ओटरे पर वही बुजुर्ग हुक्का पी रहा था और कुछ शरारती बच्चे उससे मजाक कर रहे थे …” बाबा दाल सु ज्यादा मजो तो प्लास्टिक का जूता  मे आवे न…” सुनकर वह बुजुर्ग गालिया निकाल रहा था । ऐसे मे लगे हाथ मैने भी उस पर एक फब्बी कसी.

.” बाबा दाल खाबो तो थे ही नीका जाणो , या हम जिसी नई औलांदा ने ऐया ही जनम लियो है ।” सुनकर उस बुजुर्ग ने एक गाली मुझे भी परोस दी ।

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