Category: हंसगुल्ले

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क्या आपको भी ऐसा लगता हैं कि इस तरह चलता रहा तो, 2018 में मीणायो का डिब्बा गोल हैं !

आज मेरा समाज शून्यकाल में हैं समाजहित में सोचने वालों का भारी अकाल हैं। आजकल तो हमारे युवा भी राजनैतिक गुलाम हैं, फिर हमारे पंच पटेलों भी क्या उम्मीद हैं। सब नेता भी अपनी...

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दाल में भैरण्ट करंट- साहित्यकार विजय मीणा का शानदार लेख

बात 1983 की  है जब मै पहली बार जयपुर रहने लगा । उन दिंनो बारात 2-3 दिन तक रुकती थी । ऐसी ही एक शादी में हम ( मैं और मेरे एक कजिन) हमारे...