हमारे गाँव के लोगो की विचारधारा

#मीणा_समाज -अंक-2

#हमारे_बुजर्गो_कि_आवाज।#समाज के लिए #शिक्षा।

#मीणा समाज के #गाँव के लोगों की #विचारधारा के कुछ #पहलूँ शामिल हैं और चाहे तो आप सारे #संसार के वातावरण पर इसे #लागू कर सकते है बात #साधारण_शब्दो में है.जबकी #गुढ़_स्हस्य बहुत
छिपा हुआ हैं।
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समाज के सभी #प्यारे छोटे-बड़े भाई बहनों!बुजर्ग,महिला,बच्चों और समाज के #मंच को
#राम_राम ! राधे राधे!
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श्री गुरु चरन सरोज रज
ओर निज मन मुखर सुधार;
वरनऊ रघुवर विमल जसें
जो दायक फल चार।

आज बात सिर्फ समाज की कुछ #बुराईयों पर हैं,जिसें आज आप अपने मन चाहे तरिके से कहँ सकते हैं? समाज के अंन्दर चल रही कई प्रकार की #प्रथा, #कुरूतिया और #चुनौति है।
जो समाज की एकता,अखण्डता,संम्प्रभूता आदि बनायें रखने के लिए चुनौति हैं; जिसे हम एक #आदर्श_समाज कि संज्ञा देते है उसके लिए चुनौति से भरा पड़ा हैं।
अगर हम, हमारे समाज को देखते है,तो वो एक #विविधता से भरा पड़ा हैं, चाहे हम समाज के किसी भी पहलू को उठाकर देखने पर जानगें उसकी भाषा,पहनवें,खान-पान,रंग-रूप संस्कृति आदि में कुछ चीजों में #समानता मिलती है,तो कुछ में नही ।
फिर भी हमारा समाज एक #सुंन्दर_वातावरण से भरा हुआँ हैं।
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आज समाज के भाई अपने ही समाज या अपने ही घर मे वैर/दुष्मनी रख रहे हैं;(इस #दर्शन को हम अपने परिवार,गाँव,समाज या समाज के मंचों पर दे सकते हैं)।
हम देखतें हैं,कि आजकल सभी लोग दुखी है, पहले कि बजाएँ अच्छे #साधन है, पैसे की #आवत स्रोत अच्छे है, लेकिन फिर भी जनता दुखी क्यो हैं? इसका कारण यही है कि ………

तेरे सुख से में दुखी, मेरे से काेई अौर;
ओर भई ये दुख; व्यापों जाये #जगत में,
देखलों सब #ठोर!

प्रेम ऊपर से करते हैं; देख परायों सुख, दुष्ट भीतर से जलते है. लगें कोई भाई के धक्का! तो ऐसे राजी होय जैसें लगें तेदूलकर को छक्का; नहीं ईश्वर से ढ़रते है. और विगड़ जाये कोई काम जैव से खर्चा करते है।
हें, सज्जनों में शब्द आपकों साधरण शब्दों मे लिख रहाँ हूँ, जबकी वेद,शास्त्र में भी ये बात कही गई।
देखीयें #गोस्वामी_तुलसीदास ने भी कहाँ हैं; दुष्ट #आदमी कैसे होते है.

“जैकाऊँ की देखे विपत्ती, सुख भहे जग नर्पती।”

किसी को दुखी देखलतें है, तो ऐसे सुखी हो जाते है, मानों इस संसार के राजा बन गयें ।

“जो कॉऊ कि सुने बढ़ाई, स्वास ले ये जुअर आई।”

अगर किसी की प्रशंन्सा सुनलें; अगर किसी को आगे बढ़ता देखतें, तो ऐसे दुखी होते है. मानों उनकों जुअर(बुखार) आगया हो!

#प्रेम_ऊपर से करते है, देख परायों सुख: दुष्ट भीतर से जलते हैं(अगर किसी भाई के धक्का लग जायें, तो कसे खुशी होते है, मानों कोई #तेंदुलकर को छक्का; और उसके छक्के को देखकर भारत वासियों को जितना सुख होता हैं, उतना किसी भाई के धक्का लगने पर सुख होता है.)।

“सन हीव खल पर बंधन तर् ही और खाल कड़ाएँ विपत्ती से मरईं।”
अरे बुराई करके खाते है; ओर जो कोई आगे बड़े उसी को पिच्छें लाते हैं, नहीं चुके वे मईयाँ से बैठ पराई ठौर लड़ते भैया से।
समय बदलगों भायेला………………….।
या कलयुग में बहुत से #बुगला बन रहें #हँस;
बिनकों ऐसे जानएँ जैसे #ऊग्र_सेन_के_कंस; ऐठते घर में ही डोलें और घर की करे उपाड़, परायें से मिठे बोलें, जो बढ़ीया खावें।
वो नहीं देखों जायें, दुष्ट कि छाती जल जाती है,
राखते भाईयन से चाल! भहे हाल-बेंहाल दुष्ट हो गये कंगाल। करों #उपाय_भैया!

“सदा धर्म कि #तैरे; पाप की डुबेगी #नैया।”

अब अौर यें कैसे #मुकद लड़ रहे हो गई सबकी लूट; और दो घर को हो झोपड़ों वहाँ भी पड़ रही फुट ( इसे चाहे तो समाज के #राजनीतिक_वातावरण पर लागु कर सकते हैं)।
#पॉर्टी_गांवन में पड़गी दो धेला की बात बात पें सब दुनिया अड़गी; पकड़ लई अपनी-अपनी टैंक! और कोई निचों नहीं पड़े! बड़े एक से एक।
(यही हाल #सोशल_मीडिया को हैं)

लगावे पाट्रीन में जौर और दिन के साहू कार रात मे बनें डोलें चोर! और गाँव को मैट दियों है #राग और ये पार्टी में खान-दान को जोर लगावें #ताज! विगाड़ी भली गिरस्ती की; अौर करे गाँव के #टुक आव सब खो दई बस्ती की !

#गाईयें!

ओं! पैला के घर मत बैठ: बैठावें बेईमानी से; घर में फुट पड़ेगी भैया ठौर विरानी से।………..

अब से पहले #पंच पुराने करते थे सही न्याय! एक जगह मिलकर बैठतें याभाईन में भाव: आज देख पंचन के ऊपर #पपड़ पंच आजाते है, पक्ष-पात को कंन्दा भर के झगड़े को करवाते है;

#बस्ती_की_क्लास में सब गरीब धनवान मिल जुलकर रहते सभी भाई एक समान।
जब घर बैठें सिमट के; चुगल खोर बेईमान सच्चे #सज्जन को मिले नही तब बस्ती में समान, भाई भाई में कहीन दिखें तनीक दरार! ठुकर सुहाती बात करें , कर बादें दो पाड़! खिचै भाई भाई में #मुंछ लड़ वादे कुटम;
होवे जब छोटे घर पूँछ,और करे नही कोई काम दुजा;
पार्टी में चुगल खोर की हौती पुजा बात मत मानों दुत्ता की करदों ! बैठक बंन्द उठ दे मारों #जूता की ।

आज समाज ही नही सारे संसार मे तेजी से परिवर्तन हो रहा हैं; इससे अछुता हमारा समाज भी नहीं रहा हैं, जिस प्रकार सामाजीक, राजनीतिक,आर्थिक परिवर्तन हुआ है;इसके साथ साथ ही धार्मीक कट्टरता ने समाज और देश की #मौलिकता पर प्रशन चिन्ह लगा दिया।
ऐसा नहीं है कि बुराई ही बुराई हैं हमारा समाज सुन्दरता से भरा हुआ हैं सिर्फ जरुरत इस बात कि उसमें और रंग भरे जायें ।
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यह लेख हमारे सभी प्यारे बुजर्ग आत्माओं समर्पीत हैं।
इस लेख में कुछ गलती हुई हो तो क्षमा चाहता हूँ।
आपका को बहुत बहुत प्यार और धन्यवाद!
#राम राम! राधे राधे!
By-RAGHAV SARKAR.
आगे कि हकीकत अगले अंक में।

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