लहकोड़ माता और पीलोदा गाँव के रहस्मयी किस्से

पीलौदा, घुणावत गोत्र का सबसे बड़ा गाँव है!जिसकी कुल आबादी ११८९२ है!(जनगणना २०११ के अनुसार) वर्तमान में पीलौदा गाँव तह-बजीरपुर जिला-सवाई माधोपुर राजस्थान में अवस्थित है!
समाज के बहुत से बंधुओं द्वारा मीना समाज और उसके गौत्रों के बारे में काफी कुछ लिखा जा रहा है! उस इतिहास लेखन की कड़ी में हमारे गाँव पीलौदा के घुणावतों के बारे में भी थोड़ी बहुत जानकारी अपने अनुसार उन्होंने उपलब्ध कराने की कोशिश की है!
मैंने उसे पढ़कर गाँव के कम से कम ५० बड़े बुजुर्गों से इस बारे में जानकारी ली है जिसे आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ!

आदिवासी इतिहासकार श्री पी एन बैफलावत जी गढ़मोरां,घुमणा के घणावत/घुणावत गोत्र की मीणा माइक्रो हिस्ट्री के बारे में लिखते हैं कि

गोतराजा मोर ध्वज की प्राचीन नगरी गढ़ मोरां में आज भी प्राचीन खंडहर मौजूद है | मीणा समुदाय के प्रसिद्द घणावत/घुणावत गोत पूर्वजो का निकास यही से माना जाता है |जागा पोथी और शिवजी घूमना के अनुसार घुनावत पूर्वज यहाँ के मुखिया थे धोखे से चौहानों ने इस परा कब्जा कर लिए तब यहाँ के घण राजा मुखिया ने कोल गाँव बसा बैठक बनाई | बाद में संवत 1022 (965ई०) में घूमणा गाँव बसाया | वहां गढ़ मोरां से लाइ कुलदेवी का स्थान बनाया जो मोरां माता कहलाई |

घुनावतो का गढ़मोरा का किला

वर्तमान में यह गाँव दौसा जिले की सिकराय तहसील में स्थित है | घण राजा मुखिया के नाम से इनके वंसज घणावत कहलाये बाद में घुणावत लोक प्रचलित हो गया | अब यह गाँव इस गोत्र का निकास गाँव माना जाता है |

आगे जाकर 12 भाइयो का परिवार हुआ अकाल/किसी घटना के कारण उनमे 11 अन्यत्र जा बसे और अपने अपने नाम से खेड़े बसाया | पिलु ने पिलोदा, सांकू ने सांकरवाडा,भोंट ने भोंट वाडा,पिरया ने पिलोडी बसाई पांच भाई पचवारा में जा बसे दो निवाई टोंक में जा बसे |

धीरे धीरे वंश वृद्धि हुई और 50-60 गाँव बन गए जिनमे पिलोदा और घूमणा सबसे बडे गाँव हुए | पिलोदा में इन्होने कुल देवी को लह्कोड़ माता के नाम से पूजा है | गाँव किशोरपुरा,दौसा में रोड़ा हरिपुरा और देवली भी बड़े गाँव हुए है |बन्देडिया के कान जी घुनावत प्रसिद्द हुए है |इस गोत्र के लोग उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक जा बसे |महेंद्र बलोत जी के अनुसार महाराष्ट्र मे घुणावत नलणीबाडी , तडेगावबाडी , ईबराहीमपुर, ता:भोकरदन वालुजबाडी, पिवलबाडी, ता:औरगाबाद, राजेबाडी, ता:बदनापुर में 400 साल पूर्व जाकर बसे है |

जागा की पोथी से ली गई जानकारी कुछ ऐसे हैं

पीलौदा का जागा वर्तमान में कोटा में रहता है ये जानकारी के लिए स्व. श्री मूड्याराम जी दूदावत,श्री ठण्डीराम जी सोसायटी दरवाजा,श्री धनराज जी पटेल,श्री रामस्वरूप जी पटेल,श्री रामेश्वर जी टेकाड़ा, भाई लखन रतिराम पटेल,भाई प्रेमसिंह जी अध्यापक,लहकोड़ देवी के भगत धनफूल जी,मेडिया केदार भगतजी,पूर्व सरपंच श्री भरोसीलाल जी और श्री रामखिलाड़ी जी व्याख्याता सहित बहुत से लोगों से मिलकर जानकारी ली है!
१-संपूर्ण घुणावत गोत्र का निकास गढ़मोरा से है!
२-पीलौदा गाँव का निकास लालसोट तहसील के गाँव खटवा देवली से है ना कि घूमणा से। पीलौदा गाँव घूमणा से बहुत पहले बसा हुआ गाँव है!क्योंकि पीलौदा के घुणावतों का निकास तो सीधा खटवा देवली से ही है!

इतिहासकार खोखड दादा जी कहते है कि

घुणावत गोत्र के जागा बाबा के अनुसार पीलोदा गाँव 1500 समंत के आसपास बसा हुआ है जबकि घूमना गाँव समंत 1022में घण राजा ने कोल गाँव की बैठक से घूमना गाँव बसाया। घुणावत गोत्र के मीना गढमोरा से निकास है गढमोरा से लालसोट के पास खटवा देवली बसें दौ सौ साल बाद यह चिरावंडा आकर बसे चिरावंडा में काफी समय रहने के बाद कोल गाँव आकर बसे यहा रहने के समय में घुणावत गोत्र से घण राजा हुए हैं घण राजा के नाम से कोल गाँव से दो किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ की तलहटी में घूमना गाँव बसाया,घूमना से समंत 1500 में ये निकले

एक कहावत है कि पीलू बाबा को पीलोदा साकू का साकंरवाडा भौन्धू का भौटवाडा पीर्या की पीलौडी पाँच भाई पचवारा गये ऐसी कहावत है

पिलौदा जब पीलू बाबा जा रहे थे जब पीलू बाबा एक तलाई (छोटा बांध)पर बैठे स्थानीय लोगों ने पूछा भाई कहाँ जा रहे हो तो पीलू बाबा ने कहा कि हमारे अकाल पड गया खाने कमाने जा रहे हैं एक सज्जन बोले रूक जाओ पानी पीलो, पीलू बाबा रूका तो बाबा के पास खाने के लिए रास्ते में से काचरी अपनी धोती में रखी थी जब पीलू बाबा रूका तो वो काचरी फ़ैल गईं तो वहां के लोगों ने कहा कि भाई यह तो काचरी की तरह फैलेगा स्थानीय लोगों ने कहा भाई आप तो काचरी की तरह फैलेगा तो हम कहाँ रहेंगे तों पीलू बाबा ने कहा डोडा बस जाज्जो तब से पीलोदा में डोड्याव नाम पड़ा है और आज भी डोड्याव है

घुमाना की देवी

सर्व जब पीलू बाबा जा रहे थे तब स्थानीय लोग तलाई पर बैठे थे उस तालाब का नाम लहकोड़ था उस तालाब की दीवार पाल)पर बाबा ने अपनी कुलदेवी मोरा माताजी की तस्वीर को पूजना चालू कर दिया और वो मोरा माताजी का नाम लहकोड़ पड गया जो घुणावत गोत्र के मीना पीलोदा गाँव से निकलकर डांग में बसे वो हीं लहकोड़ माताजी को अपनी कुलदेवी मानते हैं बाकी सभी घुणावत गोत्र के मीना घूमना तहसील सिकराय जिला दौसा में मोरा माताजी को ही मानते हैं बाकी सभी घुणावत गोत्र के मीना घूमना से अन्य जगह फैले हैं

पीलौदा के बड़े बुजर्ग कहते हैं कि

पीलौदा गाँव में लहकोड़ माता को पूजने का कारण है-खेड़ा चढ़ी देवी होना अर्थात् अपने खेड़े (भूभाग) में घुणावतों को बसने की जगह दी!मोरा माता घुणावतों की कुलदेवी हैं परंतु पीलौदा से जिनका निकास है वो सभी लहकोड़ देवी को ही कुलदेवी मानते हैं! दोनों माताएँ अलग-अलग हैं!

पिलोदा स्थित लहकोड़ का तालाब

लहकोड़ माता की मूर्ति लोहे की बनी हुई है इसलिए लहकोड़ नाम है!(लहकोड़ देवी मूलत: धाकड़ों और जाटों की कुलदेवी हैं)

इसलिए हर जगह इन्हें एक लिखने की भूल ना करें!

समाज सुधारक,प्रशासक रामावतार मीणा लिखते हैं कि

लहकोड़ माता घुनावत गोत्र के मीणों को कुलदेवी है नवमीं को यहाँ मेला लगता है।सारे गॉव में उत्सव का माहौल रहता है।खीर , पुए बनाये जाते है। लहकोड़ का मंदिर तालाब किनारे पर है। सुन्दर घाट बने हुए हैं।यहाँ देवी के भक्त ” परशुराम बाबा” का स्थान है।

इस स्थान पर एक होल में शराब डाली जाती है, चाहे कितनी भी शराब डाल दी जाये , होल भरता नहीं,और एक गिलास पानी डालने पर छलक जाता है।

लहकोड़ देवी को धाकड़ और कुम्हार जाति के लोग भी मानते हैं। पीलोदा गॉव, तहसील – गंगापुर सिटी ,जिला – सवाई माधौपुर में स्थित ” लहकोड़ माता” को लेकर अनेक कथाएँ इलाके में चलती है।

परशुराम बाबा शराब पीते है।पानी को वापस कर देते हैं,यह रहस्य बना हुआ है।।ओरंगजेब के जमाने में इस देवी को चुराने की कोशिश की गई थी।

पीलोदा नाम कैसे पड़ा

पीलौदा गाँव का नाम किसी पीलूबाबा के नाम पर नहीं पड़ा है! प्राचीन समय में पीलू के पेड़ों की बहुतायता के कारण ये नाम पड़ा है!
पीलौदा गाँव को बसाने वाले बाबा की ससुराल वर्तमान कटकड़ गाँव में थी जब शाम के समय वे अपनी पत्नी के साथ ससुराल से वापस अपने गाँव जा रहे थे तो पीलौदा में लोगों ने उन्हें बताया कि बाबा आगे इस रास्ते में शेर रहता है और वो इस रास्ते से जाने वाले मुसाफिरों को मार कर खा जाता है!
इस बात को सुनकर बाबा ने कहा कि पहले मैं उस शेर को मारूँगा और फिर वापस आकर आपके गाँव में रूकुंगा!

बाबा ने जिस स्थान पर शेर का शिकार किया था वो आज भी नाहर की तलाई के नाम से जाना जाता है और इसका उस स्थान पर शिलालेख है!

इसके बाद लोगों ने बाबा को पीलौदा में बसाया जिनके सात पुत्र हुए और आज भी पीलौदा में सात पट्टी मौजूद हैं! बाबा के बसने के बाद यहाँ के राजपूतों और उनके वंशज घुणावतों में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें सारे राजपूतों को मारकर घुणावतों ने अपना वर्चस्व स्थापित किया! ठाकुरों की केवल एक गर्भवती महिला जैसे तैसे अपने प्राण बचाकर भाग निकली जिसके पुत्र का बाद में पावटा गाँव बसा!
(जानकारी जागा की पोथी के अनुसार मुनेश कुमार की कलम से है)

पीलौदा में मीनाओं के बसने से पहले बहुत लम्बे समय तक राजपूतों,धाकड़ों,लोधाओं और जाटों का निवास रहा है!

वर्तमान में यहाँ से निकल कर बाहर बसे लोगों के प्रमुख गाँव-

१-नौ पट्टी का पावटा – राजपूतों का गाँव टोडाभीम
२-क्यारदा-जाटों का गाँव हिण्डौन सिटी के पास
३-हिण्डौन सिटी के धाकड़!
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