बामनबास की शान – दिल्ली वालों की ये पुरानी हवेली

भाया, कर ले सैर गाँव की

गाँव बामनवास का आधुनिक इतिहास जिस व्यक्तित्व के साथ आरम्भ होता है, यह किस्सा उसी शख्सियत से ताल्लुक रखता है. बामनवास में ‘दिल्लीवालों की हवेली’ प्रसिद्ध है. यह बड़ी पट्टी में अवस्थित है. सन 1939-40 में भीषण अकाल पड़ा था, तब इसके निर्माता इंजीनियर हरगोविंद सिंह के पिता रोजगार की तलाश में सपरिवार दिल्ली चले गये थे. आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक हुई. हरगोविंद सिंह ने वहीँ पढ़ाई आरंभ की. उच्च शिक्षा ग्रहण करते हुए वे मैकेनिकल इंजीनियर बने. दिल्ली बेस्ड कॉनकोर्ड इंटरनेशनल प्राईवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी करने लगे तब इस हवेली का निर्माण किया गया.

जिस कारीगर ने इस भवन का नक्शा बनाया उसने हुबहू दो अन्य हवेली भी निर्मित की जिनमें एक बामण बड़ौदा में बताई जाती है.

हमारे गाँव की यह हवेली भीतर से बहुत ही कलात्मक है. ख़ुशी व गमीं के अवसरों पर आनगाँवों के जो लोग बामनवास आते हैं उनमें से अधिकाँश इस हवेली को अवश्य देखते हैं.

इसके मालिक हरगोविंद सिंह हमारे गाँव के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की. गाँव के लिए गौरव की बात यह है कि जब सन 1950-60 के दशक में भारत व सोवियत संघ के बीच विकास योजनाओं को लेकर अनेक संधि-समझौते हुए थे उनमें कृषि के वैज्ञानीकरण का विषय सर्वोच्च प्राथमिकता पर था. पहली दफ़ा ट्रेक्टर व हार्वेस्टर जैसे यंत्र सोवियत संघ से आयात किये गये थे. आयात समिति के सदस्यों में हरगोविंद सिंह का स्थान महत्वपूर्ण था. इस सिलसिले में उन्होंने कई बार सोवियत संघ की यात्रा की.

वे जिस कंपनी से जुड़े थे वह भारत में आयात की जाने वाली मशीनों के मामलों में मुख्य भूमिका निभाया करती थी. उसके प्रमुख किरदार थे हरगोविंद सिंह जी. मशीनों का परीक्षण व सञ्चालन के प्रशिक्षण का जिम्मा उन्हीं का हुआ करता था. इस गतिविधि के मुख्य केंद्र बुदनी व हिसार हुआ करते थे. उन दिनों भारत में जितने भी स्टेट कृषि फ़ार्म विकसित किये गये उन सब में हरगोविंद सिंह जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. कृषि यंत्रों के सरल सञ्चालन के उद्येश्य से उन्होंने हिंदी में एक पुस्तक भी प्रकाशित करवाई थी.
यह मेरा सौभाग्य है कि मैंने उन्हें निकट से देखा है. यह बात सन 1969-70 की है जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था. उसी साल हमारा माध्यमिक विद्यालय क्रमोन्नत होकर सैकेंडरी स्तर का बना था. उन दिनों हरगोविन्द सिंह जी गाँव आये हुए थे. वह गणतंत्र दिवस का अवसर था. उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में स्कूल में आमंत्रित किया गया. छ: सवा छ: फीट का ऊँचा कद, रूसी कलर का गोरापन, सुदर्शन तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे. वक्तव्य क्या दिया, यह मुझे याद नहीं है. उनकी छवि आज भी मेरे दिलोदिमाग में सुरक्षित है.
मुम्बई में हेलीकोप्टर दुर्घटना में वे गंभीर रूप से घायल हो गये थे. उनकी रीढ़ की हड्डी में घातक चोट लगी थी. इलाज़ के लिए उन्हें अमरीका भेजा गया. भारत व सोवियत संघ के मध्य चल रहे निकट संबंधों को लेकर उन दिनों अमरीका की गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. काफी सक्रिय हुआ करती थी. कहते हैं कि अमरीका में इलाज़ के दौरान सी.आई.ए. ने उन्हें स्लो पॉयजन दे दिया. उसके बाद वे ठीक नहीं हुए. अंतत: 6 मार्च, सन 1984 की तिथि को उनका देहांत हो गया.

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