मीणा लोक-साहित्य की लोकप्रिय विधा-मीणावाटी गीत.. सबसे निराले हैं ये आदिवासी गीत

मीना लोक साहित्य—-

वृहद विस्तार क्षेत्र गायन की स्वतंत्रता, लिंग-भेद का अभाव, प्राचीनता, सर्वत्र प्रचलन, सार्वकालिक,प्रेमाभिव्यंजना के आधिक्य एवम् मीणाओं के पर्याय आदि गुणों एवम् विशिष्टता के कारण आज मीणावाटी गीत लोकप्रियता की दृष्टि से इस अंचल में प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं । इन गीतों में वय-संधि की उमंग और उल्लास है तो प्रेमियों का प्रेमोच्छवास, बैलों के गले की घंटी की मिठास है तो उन्मुक्त खेत-खलिहान का रुप लावण्य, प्रेमियों की पुकार है तो विरहिणी कृषक बालाओं की विरह वेदना, अनमेल विवाह की पीड़ा है तो दहेज का दंश, संयोग ओर वियोग से आप्लावित यह मेघ अपनी फुहारें यत्र-तत्र मुक्त रुप से छिड़क कर मन और मस्तिष्क को सुखद,शीतल एवम् अमृत सादृश्य अनुभूति से द्रवित करता रहता हैं ।
ध्रुव तारे की भॉति मीणा लोकसंगीत में र्शीषस्थ स्थान पर आलोकित इस विधा की उत्तपत्ति को जानने की जिज्ञासा मेरे मन मस्तिष्क पर आना स्वाभाविक ही था । इस दिशा में मैंने एक यायावर की भांति स्थान स्थान पर घूमकर प्रयास किये परन्तु लिखित साक्ष्यों के अभाव में केवल जनश्रुतियाँ एवम् अनेक ग्रामीणों की धारणाओं के आलोक में ही इसकी उत्पत्ति और विकास पर कुछ अनुमान लगाने की स्थिति में पहुंचा जा सकता हैं ।

इस संबंध में टोडाभीम निवासी बोधराज का मानना है कि ये गीत मीणाओं को ईश्वर ने प्रसन्न होकर दान में दिये थे इसीलिए शुरु शुरु में इनमें धार्मिक प्रवृति वाले गीत गाये जाते थे । इसी क्रम में उकेरी निवासी विश्राम मीणा का मन्तव्य कुछ इस प्रकार हैं –

‘पहले जब हल चलाते समय कुछ थकान महसूस होती थी एव बैलों को भी हांकने के लिए बार बार कुछ न कुछ बड़बड़ाना पड़ता था तो एक बार एक हाड़ी ने जब कुछ बातों को गीत के लहजे में गुनगुनाया तो उसके बैल अनायास ही तेज चलने लगे ओर उसे खुद भी थकान कम महसूस होने लगी। इसी तरह इन गीतों का चलन हो गया ।’

गंगापुर सिटी में मिले एक बुजुर्ग श्री रामधन मीणा ने इस पर प्रकाश डालते हुए बताया कि-

‘ पहले शादी भ्याव में बारात तीन-चार दिन तक ठहरई, तो बराती टैम पास करबा कू गीत गावा । वहाँ पै ही बैरबानी भी बरातीन सू छेड़छाड़ करबा इस्या गीत बणा बणार गावई जो मजाकी लहजा का हा ।’

कदम खंडी के मेले में मिले इन गीतों के बड़े शौकीन और गायक श्री राम प्रसाद मीणा कहते हैं कि- ‘ पुराणे समय में सब लोग अनपढ़ हा, चिट्ठी पतरी लिखबो कोई जाणों कोन हो, तो वा टैम पै पत्नी या प्रेमिका अपणा ह्रदय की बातन ने इन गीतन का जरिया सू ही बतावेई और उनको उत्तर भी इस्या गीतन सू ही मिलजावो, जेई सू ये गीत ज्यादा चलबा लगगा।’ इसी प्रकार सिकराय निवासी एक अध्यापक श्री रमेश चन्द मीणा इन्हें सम्मोहन गीत के रुप में इनकी उत्पत्ति मानते हुए कहते है कि-‘ प्राचीन काल में प्रेमी व प्रेमिका इन गीतों को गाकर एक दूसरे को सम्मोहित कर अपने प्यार का इजहार करते थे और अपने प्रेम को इन्हीं के माध्यम से परवान चढ़ाते थे ।’

राजकीय महाविद्यालय गंगापुर सिटी में सेवारत संस्कृत के व्याख्याता श्री रामकेस मीणा के शब्दों में ‘ मनुष्य सामाजिक समस्याओं, विचारो तथा भावनाओं का जहाँ सृष्टा है वहाँ वह उनसे प्रभावित भी होता हैं, अत: इन गीतों के रुप में मानव मन की सहज व अनुभूतिगम्य भावनाओं और कल्पनाओं का फूट पड़ना स्वाभाविक ही था ।’ 

उपर्युक्त मत-अभिमतों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि ये गीत मानव मन में उठने वाली उन्मुक्त हिलोरों, मनोरंजन की आकांक्षा, उत्सवों की अनिवार्यता तथ शारीरिक थकान के ह्रास हेतु प्रचलन में आये । बाद में इनमें विविध विषयों का समावेश होता रहा तथा अपनी गेयता के कारण जनमानस में रच बस गये । 

मीणावटी गीतों के तीन प्रकार प्रचलन में हैं ।

1. एक आँट(अंतरा) वाले 

2. दो आँट (अंतरे) वाले

3. पचवारा 

एक आंट के गीतों का पूर्व-प्रचलित रुप अब प्रचलन में नहीं हैं तत्पश्चात् इसका संशोधित रुप अद्यतन अस्तित्व में है । इनमें एक ही अंतरा प्रधान होता हे तथा अंतरे के प्रथम शब्द की पुनरावृत्ति के साथ् ही इसका तोड़ होता है –
पूर्वप्रचलित रुप – मैं चाल्यो मेड़ा कू गहणों डूंडड़ी में दे चाल्यो ।- मैं चाल्यो ।।

काको छंडगो बड़ में काकी नीचा सू डकरावेरे । काको छडगो।।

इन गीतों में अधिकांशत: अश्लील गीतों की भरमार थी इसी कारण इनका अंत निश्चित था परन्तु गायकों और लोक कवियों ने इसमें साधारण सा परिवर्तन कर इसकी भाषा एवं विषय वस्तु को बदल कर एक नये रुप का प्रादुर्भाव किया जो आज लोकप्रियता के साथ अस्तित्व में है ।

नवीन रुप – शंकर बाजरा की बाल बराबर म्हारो परण्यो ।

जयपुर जातो तो आ जातो अजमेर गयो दीखै ।

इन गीतों को गाते समय दो या तीन बार दुहराते हुए गाते है । इन गीतों में श्रंगार के दोनों पक्षों यथा संयोग और वियोग के विभिन्न रुप मिलते हैं । इसके साथ् ही ये मुक्तक शैली के गीत होते हैं । इनकी विषय वस्तु दैनिक जीवन में घटित घटना एवं प्रेमी-प्रेमिका के हाव-भाव, चे-टाऐं आदि का वर्णन होता हैं । यहाँ इसके वैविध्य के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

मनौती

तेरे धजा चढ़ाऊं महावीर

पति म्हारो पास हो जाय तो । 

अनुमान

मुकरी को ठण्डो डील 

नड़ा में न्हायाई दीखे रे । 

पश्चाताप

सैंदा भायेला सू बिन्या मिली,

ले चाल्यो परण्यो । 

मुक्तक रचना होने के कारण इनमें विविध भावों का प्रकाशन होता हैं। इन्हें एक के बाद एक लगातार गाया जाता है । ये आकार में छोटे होते हुए भी उस भाव को दर्शाने में समर्थ होते हैं ।

दो आँट वाले गीत

इन्हें ऊंचे सुर में गाया जाता है तथा इसमें दो अंतरे होते हैं । लोकप्रियता की दृष्टि से इनका स्थान अद्धितीय हैं । इन्हें कई स्थानों पर दो बोला के नाम से भी जाना जाता हैं । इनका प्रतिपाद्य मुख्य रुप से मुक्त विषय होते हैं परन्तु इसमें धार्मिक कथानकों पर आधारित रचनाऐं भी मिलती है । इनमें श्रंगार के दोनों ही पक्षों का निर्वाह भली- भांति हुआ हैं। परन्तु वियोग पक्ष के गीत अपना प्रभाव त्वरित गति से डालते हैं । यहाँ दोनों पक्षों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

  • वियोग श्रंगार –

पडबाड़ा की नार कुआ पै एकली रोवे रे, 

बाबुल सू खै दीज्यों दुख तेरी लाडली पावे रे,

कहां हेरुगी परण्या दो कोलेज दौसा में रे,

म्हारो हंसतो फूल कुमलगो, म्हारी जीजी नाटगी दीखे ।

यहाँ प्रथम गीत में एक नवयौवना जिसका पति पढ़ने बाहर गया हुआ हैं । वह विरह वेदना में अत्यंत दुखी हो रही हैं । घर में अपनी विरह- वेदना को लज्जावश कह नहीं पाती । जब वह पनघट पर पानी भरने जाती है तो एकान्त पाकर पति की याद में आंसू बहाने लगती हैं ।
द्धितीय गीत में जब विरह असह हो जाता है तो पथिकों से अपने पिता के घर सन्देश भिजवाती है कि आपकी लाड़ली बेटी ससुराल में बहुत दुखी है आकर मुझे ले जाऐं ।

तृतीय गीत में जब पीहर पक्ष से कोई नहीं आता तो विरहणी स्वयं अपने पति से मिलने उसकी कालेज ही जाने का निर्णय करती है परन्तु वह दुविधा में है कि वहां तो कई कालेज है मैं उन्हें वहां कैसे ढूँढ पाऊंगी ।

इन गीतों में विरह की मार्मिक स्थिति का चित्रण किया गया हैं तथा विरहणी के हाव-भाव एवं मनोवृति का चरम उत्कर्ष इनमें दृष्टव्य हैं।

  • संयोग श्रंगार –

तेरे मारया मुकरी भाई की बरात छोड्यायो रे,

भाई की बरात छोड्यायो ।

भारी हद लागे रे पतली सी माथे झेड़ धरती रे,

माथे झेड़ धरती ।

तोनें ले जाऊं रे पतली सी डर घरकान को लागे, रे

डर घरकान को लागे ।

बैरी बामण होगा लागे दाड़ की पूजा, रे

लागे दाड़ की पूजा ।।

नायक व नायिका की सगाई पक्की हो चुकी है परन्तु अभी विवाह नहीं हुआ । नायक ने सगाई से पूर्व नायिका को किसी उत्सव में देख लिया और मिलने की इच्छा अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई । नायक छुपते छुपाते नायिका के गांव के बाहर पनघट की पगडंडी पर मिलने आ जाता है। नायिका पानी लेकर उधर से गुजरती है तो नायक को सामने देखकर ठिठक जाती है । नायक कहता है कि हे प्रिय तुमसे मिलने के लिए तो मैं अपने भाई की बारात को भी छोड़कर यहाँ आया हूँ । जब तुम सिर पर पानी की मटकी लेकर चलती हो तो तुम बहुत ही सुन्दर लगती हो और तुम्हारी यही छवि मुझे तुमसे मिलने को मजबूर कर देती है । कई बार सोचता हूँ कि अब तुम्हारे बिना जीना असहाय हो गया है, तुम्हें साथ ही ले चलूं परन्तु घरवालों का डर इसमें अवरोध बन रहा हैं । अब तो ब्राहमण भी हमारे दुश्मन बन गये हैं जिन्होंने मुहूर्त के लिए यह कहकर मना कर दिया कि इसमें दाल की पूजा लग रही हैं । इन गीतों में सूक्ष्म भावों की अभिव्यंजना व नायक- नायिकाओं की चेष्ठाओं का प्रतिफलन सहज व अकृतिम हैं । इनमें नायक- नायिकाओं के रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े पहलू व उनके आस-पास के परिवेश, ग्राम संस्कृति व यहाँ की प्रथाओं के अनेको उदाहरण भरे पड़े हैं । यथा –

देख जवानी का झटका मटकी तीन सिर पै, रे

मटकी तीन सिर पै ।

काम करुं चित वहां रे टिरोली का टैर पै कूदे, रे

टिरोली का टैर पै कूदे ।

मेरे इसी जचे भाई जीजी होल्यु लारे बैग वाड़ा कै, रे

होल्यु लारे बैग वाउ कै ।

तेरो कांई बिगड़े लोहड़ी सी म्होंडो देख ले बादे, 

म्होंडो देख ले बादे ।

हाथ दियो बस गई रे कांई बैल्यू बालमा तेरी, रे

कांई बैल्यू बालमा तेरी ।

इन गीतों में इस अंचल का बैविध्य और वैशिश्ट्य यत्र-तत्र बिखरा पड़ा हैं । एक ओर जहाँ पति-पत्नी की अठखेलियां है तो दूसरी ओर प्रेयसी की मिलनेच्छा, सास-बहू के झगड़े, पति को उपालभ्य, ननद के शिकवे-शिकायत , धार्मिक कथानकों पर आधारित अनेकों निश्छल भाव इन गीतों में गूंजते हैं । नवयुवतियां इन गीतो को विभिन्न उत्सव, समारोहों से लेकर खेत-खलिहान तक में मुक्त कंठ से गाती हुई नजर आती हैं । दौसा व जयपुर के कुछ क्षेत्र में इन गीतों को ‘ पचवारया गीतों’ के नाम से भी जाना जाता है,जिनमें धार्मिक कथानकों पर आधारित बहुत अधिक गीत मिलते है । 

-ज्यानकीय रावण लेगो आवे कोड़ा सू, 

जल की तीरयां तीरयां डोले लक्ष्मण राम जोड़ा सू । 

सात जुगन को प्यासो पंछी ठाड्यो जल में, 

तोने भगत बताउ रे नारद म्हारे लारे चाल बन में 

बन में जावे, क्यूं दुख पावे, होटो आ ज्यायगो, 

सेवा मात-पिता की करलै यहाँ ही भगवान आज्यायगो। 

अमर गुफा का अमर पेड की बैढ्यो जड़ में, 

सारी अमरकथा ने सुणगो सूवो बैठ बड़ में ।।

कहां सू आयो कुण को जायो कुण सू वा अडै, 

कुण ने तोड़यो रे धनु-ष आगी आंगड़ी तडै , 

अलवर की सड़क्यां रे माथे रिपटण होरी सै, 

कैंया आऊं रे भरथरी बाबा बिरखा जोर देरी सै, 

कड़डी छाती करके राणी आजा मज में, 

आरो न्यूं चिमके हात्या में राजा मोरधज के, 

कोई दिन ईया ई मरैगो लक्षमण राम करता,

लक्ष्मण राम करता ।।

डटजा डट जा म्हारा राजा,

राणी पींगला नटैं, रे राणी पींगला नटै ।

राणी तारावती बामण् के,

पाणी पीसणो करे।

राजा तो हरिचन्द पाणी भंगी के भरे, 

इन गीतों की धुन बड़ी ही लुभावनी होती हैं । ज्ञान विषयक गीतों को ग्रामीण जन रात्रि के समय अधाणे ( अलाव) पर बैठकर बड़े ही चाव से सुनते और गाते हैं । कभी-कभी इन गीतों के गवैयो को भी बाहर से बुलाकर विभिन्न आयोजनों पर इनका गायन सुना जाता है । इन गीतों में ओज व माधुर्य का सुन्दर सांमजस्य देखने को मिलता है साथ् ही शांत रस का परिपाक इन गीतों में बड़े ही सहज ढ़ंग से होता हैं ।पचवारा गीतों के प्रसिद्ध गायक श्री प्रताप मीणा, कैलाश ड्राईवर एवम विष्णु मीना प्रमुख हैं ।इस अंचल में इन्हैं लोग आजकल सीडी के माध्यम से भी बहुतायत से सुनते हुए दिखाई देते हैं ।

मीणावाटी गीतो का प्रसार क्षेत्र सम्पूर्ण दौसा, सवाईमाधोपुर, जयपुर,अलवर,करौली,टोंक जिलों एवम् भरतपुर की बयाना, वैर एवम् नदबई तहसीलों में हैं । इनमें इस अंचल की बोली का ठेट रुप दिखाई पड़ता हैं । भरतपुर, जिले में इनमें आंशिक ब्रज का, दौसा व जयपुर में ढूंढाड़ी का प्रभाव भी परिलक्षित होता हैं । मीणा जाति में सभी जगह एक जैसे आचार-विचार, रीति-रिवाज एवं विहावोत्सव की समानता की वजह से इनकी कथावस्तु भी सम्पूर्ण अंचल में एक जैसी ही मिलती हैं । सामाजिक दृष्टि से भी इन गीतों का अन्यतम महत्व है । एक ओर सामाजिक परम्पराएं एवं संस्कार हैं तो दूसरी ओर सामाजिक कुप्रथाएं जैसे अनमेल विवाह,बाल विवाह, बहु विवाह, अंधविश्वास, रुढि़यों का चित्रण इन गीतों की खास विशेषता है । पहले हमारे समाज में अनमेल विवाह होते थे लेकिन आज इस सामाजिक अभिशाप का विरोध आवश्यक है ।

यहां की बोली के ठेठ शब्दों का मुक्त प्रयोग इन गीतों की विशेषता है जिनमें नवयौवना के लिए मुकरी या टन्न गिंदोड़ी शब्द प्रयुक्त हुआ है इसी प्रकार भायेला (प्रेमी), भायेली (प्रेमिका), परण्या (पति) आदि का प्रयोग किया हैं । विशेषण रुप में लोहड़ी सी (कमसिन उम्र की नायिका), पतली सी (छरहरे बदन की नायिका) तथा जीजी (माँ) व काका (पिताजी) के लिए प्रयुक्त हुआ हैं । 

मीणावाटी लोकगीतो की उपर्युक्त दोनों श्रेणियों में आहलाद, सत्य भावना तथा श्रंगार के दौनों पक्षों का सुंदर समन्वय हुआ है । आमतौर पर प्रयुक्त उपमानों में खिलने वाली इंद्रधनुषी छटा भावुक ह्रदयों में थिरकन पैदा करती है । ये गीत पढ़ने के लिए नहीं अपितु, सुनने के लिए हैं । इनमें मुख से उत्पन्न होने वाली लहर ही मुख्य है जो सुनने वालें को उन्मत्त बना देती हैं । मीणा जाति में कोई भी ऐसा सहद्धय नहीं होगा जिसने इन गीतों पर कायिक अनुमान प्रगट नहीं किया होगा । यही इन गीतों की लोकप्रियता की कुंजी हैं । 

( साभार मेरी पुस्तक मीना लोक साहित्य एवम संस्कृति से)

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