मीना लोक गीतों में पति पत्नी में हास परिहास

मीना लोक गीतो में पति-पत्नी में हास- परिहास- उपालभ्य— पति -पत्नी गृहस्थ जीवन रुपी रथ के दो पहिये हैं अतः इनमें सांमजस्य रहना बहुत जरुरी हैं । इस हेतु दोनों में हास-परिहास, रुठना-मनाना, उपालभ्य देना जैसी क्रियाऐं भी आवश्यक हैं । नव-वधू जब अपने घर आती है तो पति आधिकाधिक समय अपनी पत्नी के पास रहना चाहता है इस हेतु वह अनेक बहाने ढ़ूंढ़ता है । मीणा लोक-काव्य में इस मनोस्थिति का वर्णन पर्याप्त रुप में हुआ है । यही हाल पत्नी का है। वह भी चाहती हैं कि उसका पति उसके पास ही रहे ।कुछ स्फुट उदाहरण…… 1- म्हारा दिल में चिंता जीजी छोडयाई दूखतो माथो……… 2- खिंदा बडादे जीजी अकेलो रोयो रात बाडा में….. यहां पत्नी को आए एक ही दिन हुआ अपने पीहर में लेकिन उसे अपने पति का सामीप्य याद आ रहा है । वह वापिस जाना चाहती है परन्तु लाज वश कह नहीं पाती तो उसे एक युक्ति सूझती है । वह अपनी मां से कह रही है कि मां कल जब मैं आई थी तब उन्हे अस्वस्थ ही छोडकर आई थी । पता नही अब कैसे होंगे । अन्योक्ति के माध्यम से उन्होने इस गीत में बडी ही बारीकी से अपने मनोभाव व्यक्त किए हैं । 3- छोरा खांकी करी बीएड जवानी की रेड करदी……. पति के लम्बे अंतराल के बाद , पढाई सम्पूर्ण होने के बाद मिलन पर पत्नी द्वारा इस गीत में बहुत ही सुंदर उपालभ्य के माध्यम से परिहास व्यक्त किया गया है । वह उस बीते समय को कोस रही है जिसके दौरान उसने विरह का असह दुख झेला लेकिन परवश थी क्योंकि पति पढाई करने में व्यस्त था । 4- तू तो लगा सटर सो जाज्यो, म्हारी आई रात की ड्युटी…… इस गीत में पति को उसके अकेलेपन और अपनी रात की ड्युटी पर खीज आ रही है । उसे विरह की उस तडपन का आभास है जिसे उसकी पत्नी भोगेगी । 5- मैंने ही करयो टेलीफोन उठाओ क्यों ना बावडी तैने…… 6- डटरे बैरण हिचकी शरम आवे डोकरी गोड्या…… उपर के दोनो गीतो मे लोक लाज का प्रतिफलन हुआ है । आज भी ग्राम्यांचल मे आदिवासी स्त्रियां श्वसुर और सास के आगे इस प्रकार की लज्जा के वशीभूत पति से सीधे बात नही करती । 7- मैं तो याई पै सबर कर ल्यूंगो हंसती खेलती रीज्यो….. पति बाहर अपनी ड्युटी पर जा रहा है और पत्नी को प्यार भरा आश्वासन भी दे रहा है कि तुम मेरी चिंता मत करना । तुम खुश रहना , मै तो उसी से अच्छी तरह समय व्यतीत कर लूंगा । कई स्त्रियो आधुनिक परिवेश के अनुसार राजनीति मे जाने की भी इच्छा रखती है । यहां इसी प्रकार का एक परिहास पत्नी द्वारा….. 8- तू तो ढोला लड सरपंची, मैं डायरेक्ट लडूंगी रे। छोटा देवर कू एमेले खडो करूंगी रे ।. इस प्रकार के हास परिहास रुठना मनाना , उपालभ्य देना मीणावाटी लोक गीतो मे प्रचुर मात्रा मे समाहित है । यही इनकी थाति है । लोक संस्कृति एक ऐसा प्रवाह है जिसमें अन्य जाति की आदिम वासनाओं,भावनाओं और संस्कारो के आधार पर ही शिष्ट परंपराओं में अग्रसर होने वाली मानवीय संस्कृति के विभिन्न तत्व समाहित होते जाते हैं । लोक मानस, विचारशील की अपेक्षा भावुक अधिक होता है । उसमें बुद्धि तत्व की अपेक्षा ह्रदय तत्व की प्रधानता होती है । लोक चेतना ही इसमें चलकर जीवन दर्शन बनती है । मीना लोक काव्य में यह जीवन दर्शन, भाव सौन्दर्य के रुप में प्रतिष्ठापित हुआ है। इसमें बसी यादों की विविधता उसके निराले सौन्दर्य की साक्षी है । मीना लोक काव्य जनमानस में बहुत गहराई तक पैठ रखता है । इसी कारण इस समाज के सुख-दुख, उपेक्षा,घृणा, प्रेम, आदि सभी मानवीय संवेदनाये लोकगीतों के रुप में बाहर आती हैं । यहां के लोक काव्य में पारिवारिक जीवन के मानवीय बोध की विस्तृत झांकी मिलती है। ( साभार विजय मीणा जी की पुस्तक मीना लोक साहित्य से )

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