श्री कृष्ण और मीणा समाज।

मीणा दर्शन ।
हमारे बुजर्गो कि आवाज।सबके लिए शिक्षा।
श्री कृष्ण और मीणा समाज।

आज जिस प्रकार समाज अपने प्रगतिशील मार्ग पर बढ़ रहा है, साथ ही UNITED_MEENA_COMMUNITY का एक स्वरुप धारण करने जा रहा है, हिन्दूस्तान में मीणा समाज ने तेजी से अपनी एक नई पहचान कायम कि हैं, ये मीणा समाज के लिए गौरव पूर्ण हैं।
प्राचीन काल से ही मीणा समाज के लोगों के अन्दर जो मानवीय गुण हैं,दया_धर्म_प्रेम_त्याग_क्षमा ये सभी संत को दृशाता ह़ै, और ईश्वर के साथ अपने आप को बहुत करीब पाता हैं, परन्तु चिंता कि बात है, कि समाज का कुछ वर्ग धीरे धीरे आधुनिकरण की मधशाला में अपने ज्ञान का अहंकार लिए और अपनी कुतर्क समझ के माध्यम से चीजों को परिभाषीत कर रहा है.जिसके के कारण समाज अपनी #मर्यादा_खण्डीत कर रहा है।
आज #कलयुग के वुगला बनें हुऐं हँस;भगवान कृष्ण की #लीलाओं को जिस प्रकार से देख रहा हैं;उन पर कतुर्क करते है.जिससें समाज की घटती हुई मौलीकता को दर्शता है। संसार का वातावरण तो दूषीत हैं; आज समाज का दर्शन #बुजर्ग लोगों तक ही सीमट कर रह गया हैः
आज के माहूल में भगवान कृष्ण कि लिलाओं पर शंका करने वालें बहुत है? बैसे तो ज्ञानी भी शंका करते हैं।
कुछ #सत्य मीणा दर्शन यू कहता है………..:::।

हाँ जी, तों ये चौरासी कौस में; और चार धाम निज धाम,
ऐ जी वृंन्दावन, मंधपूरी तो बरसानों नंन्द गांव।
ऐ जी वृंन्दावन सम वंन नही तो नंन्द गांव सम गाँव;
और बंन्सी बटसौं बट नही, तो कृष्ण नाम सम नाम।

अब वृंन्दावन धाम बड़ो सजनीई,…..””
जहाँ वास करें नित सारंग पानी और जै पग शैष,महेश् रटें सौंय पाय पलोटत राधिका रानी!

हाँजी,तो भान शुतामल धौवत हैं, जॉको निर्मल बहें सदा जल पानी;
और यमुना यम दुतन टारत है, भव टारत श्री राधीका रानि!

हाँजी, श्री कृष्ण ने अवतार लेर; बुज भूमि पावन कर दई;
और गईया चराई नंन्द की, लीला करें प्रभू नित नई।
दुष्टों को नित संग्राहार दे! ग्वालों के संग क्रिड़ा करें;
बृज में बसें ब्रजराज; वन भगतो के संकट को हरें।

अरें! त्रैता में श्री रघूनाथ को बन, शिव को धनुष खण्डन कियों; और सीता के संग सादी करी अौर सखीयन के मन को मोह लियों।

रघुनाथ के लख रुप को; मिथला पूरी की भामनी,
सौचे खड़ी में भी बनू श्री राम जी की कामनी;
तो मिथला पूरी वे संखी बृज गोपीया को तन अवतरी,
श्री राम जी ने श्री कृष्ण बन अवलास पूरी करी!

हाँजी, वृंन्दावन की गौपिका; और नित उठ देव मनायें।
नित उठ वृर्त धारण करें तो मोहन वर मिल जायें;
गोपीका जमूना जी पें जावें;ओर खोले तन के वस्त्र नगन होकर के नहावें।
अरे! देंख सखीन को अंग नीर मे वरुण देव सखुचावें;
और एक दिन ये खबर बृज राजकुमर पावें।
हुगाड़ी नहावें गौरी, करू चीरन की चौरी;
वरुण का जल में वॉसा।
और गुढ़ ज्ञान मिल जाये सखीन को हो जायें,
प्रकट तमाशा।

हाँ बन्धुओं ( ये गोपी चीर हरण का प्रंसग आप RAGHAV vanshivare sarkar की लेखनी को पढ़ रहे हैं, बैसे तो महान कवि, पद गायक श्रीधवले राम मीना जी, (लालारामपूरा, करौली) ।उनके मूल चितंन पर आधारीत हैं।
ध्यान पूर्वक पढ़ों;
भगवान श्री कृष्ण ने गोपीयों के लियें गुढ़ ज्ञान दिया था जब उन्होंने सुना की बृज की गोपीका मेरी भगती करती हैं; अौर वो जमूना जी में नग्न स्नान करती है, तो उनकी सब भगती_खण्डीत हीती है; इसलिए ये लीला भी हो जायेगी और गोपीयों को गुढ़ ज्ञान मिल जायेगा; उधर बृज कि गोपीका कार्तिक स्नान करती हैः और श्याम को अपनी सखीयों से बात चीत करती हैं,
अरी सखी जल्दी सौ जाओं इसलिए सुबह जल्दी चेत हो जायेगों । जब जमूना जी में कातीक स्नान के लिए चलेगीं
देखियें गोपी आपस में एक दूसरे से क्या #मसबरा करती हैं?

हाँ ! हाँरे मॅहारे लारें चालेतों #भायेली बैगी सौ जाज्यों ;
…………. ……..सहैली बैगी सौ जाज्यों, ओ. कातीक नहावें तों सिधों सी बैठी हो जाज्यों……..

बन्धुओं! भगवान कृष्ण ने पहले राम अवतार में जनक पुर मे शंकर का धनूष खण्डन किया और सिता के साथ में सादी की, उस वक्त ये बृज की गोपीका वहाँ जनक पूर में सभी सीता की सहेली थी इन्होने भी अपने मनमें मे कामना की थी भगवान हमारे साथ भी सादी करें।
तो बन्धुओं जनक पूर की सखीयों को भगवान कृष्ण ये वृदान देकर आये थे,कि में द्वाआपूर यूग मे(द्वाआपूर के चौथे चरण)कृष्ण का अवतार लेकर और बृज में तुम्हारीइच्छा को पूर्ण करूंगा ।
देखीयें वही समय अब आगया बृज गोपी आपस में कातीक स्नान की मसबरा करती हैः::::

हाँजी बृज की सारी सखी रोज कातिक नहावें जावें! और नित उठ है सादे नैम; ये बृज राज कूमर पावें; खबर मोहन ने सुन पाई अौर होके तन से नगन सखी सब जमूना में नाहीई ।
सखी कातीक में स्नान करती और जमूना में जाकर नगन नहाती ;ये खबर भगवान कृष्ण ने सुन ली गोपीका जमूना जी मे नगन स्नान करती हैं।

तो बन्धुओं एक दिन कृष्ण सखी से पहले जाकर कर जमूना जी में छिप जाते है, अौर क्या करते हैं?

यहाँ से आगे की लीला youtube पर मिलेगी; गोपी चीरहरण्।
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यह लेख सभी महान_आत्मारुपी_देवतय को समर्पित हैं।
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लेख में कुछ गलती हुई तो माफी चाहता हूँ।
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By-राघव सरकार

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