आदिवासी एकता समय की मांग

 

#आदिवासीएकतासमयकीमाँग_है कुछ लोगों ने अपनी व्यक्तिगत खुन्नस को समाजसेवा का प्लेटफॉर्म बना दिया है।
लोगों ने गर अपनी बुद्धि और विवेक का सहारा नही लिया तो कुछ होशियारचंद लोग समाज को अपने सोच के दायरे में समेटकर उन्हें भक्त बने रहने देने में ही समाज सेवा का डंका पीटते रहेंगे।

यदि व्यक्तिगत मतभेद और अहँकार को लोग तवज्जो देकर सामुदायिक हित को हासिये में डालेंगे तो हो गया अधिकारों की लड़ाई।
गर एकता नही बना पाएंगे तो सिर्फ झक ही मारेंगे !
एकता बनाये रखने की कीमत पर रूढ़ि और प्रथा बचा कर भी हम संवैधानिक अधिकार नहीं पा सकते। बस्तर के आदिवासी लोग पूरी परंपरा रूढ़ि प्रथा के साथ जी रहे हैं। उन्हें कोई भी आदिवासी संगठन बचा क्यों नही पा रहे हैं ज़रा सोचिए ? जो आदिवासी कट्टरता की बात करते हैं उन्होंने आदिवासी शोषण, अत्याचार, अधिकार और संरक्षण की कोई कानूनी लड़ाई के लिए न्यायालय में कोई याचिका तक दायर नही किये हैं, बस बेलगाम मंचीय भाषण देकर समाजसेवा का दूकान चला रहे हैं।
सामुदायिक हित और एकता बनाये रखने के लिए हमे अपने व्यक्तिगत सोच और अहम् को बिल्कुल भी जगह नहीं देना चाहिए।

जय सेवा जय जोहार जय उलगुलान

 

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