मानवता का बदलता स्वरूप

मानवता का बदलता स्वरूप

*बदलते सामाजिक परिवेश में बदलते मानवता के मायने*
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मानवता मतलब ऐसा मानविक कार्य जिससे किसी असहाय जरूरतमंद एवं कमजोर जीव या जीवो के किसी समूह का कल्याण हुआ है
सच्चे मायने में यही है मानवता जिसमे ना धर्म होता ना जाती होती ना कुछ और बस कार्य होता है वो भी बिना किसी भेदभाव के
मगर डिजिटल होती दुनिया मे इसका भी स्वरूप बदलता जा रहा है आजकल लोग धरातल पर जाने की बजाय ऑनलाइन मानवता का पाठ ज्यादा पढ़ा रहे है ऐसा करना चाहिए ऐसा नही करना चाहिए वगैरा वगैरा
क्या बस आपके सुझाव देने मात्र से हो गया मानव कल्याण क्या मानवता बस इस रूप में सिमट गई
अब देखिए न थोड़े दिनों पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमे एक लड़की ट्रैन के सामने खड़ी हो जाती है और आधुनिक समाज के भद्र पुरुष उसे बचाने की कोई कोसिस किये बगैर वीडियो बनाने में व्यस्त रहते है ओर कुछ दिनों बाद उसे सोशल साइट पर upload करके अपनी बहादुरी के चर्च कहते है कि मैंने लाइव वीडियो अपलोड किया है
ओर हम क्या करते है like comment ओर shear
बस निभा दिया हमने मानव धर्म

कोई पोस्ट डालकर कहता है की ये बच्चा गुम हो गया है कृपया ढूंढने में मदद करे
ओर होता क्या है ज्यादातर मामलों में हम उसको दुसरो को फारवर्ड कर देते है और वो किसी तीसरे को क्या हम किसी बच्चे को ढूंढने गए
शायद नही क्योंकि हमारी मानवता मोबाइल तक ही सीमित रह जाती है जब तक कि प्रभावित व्यक्ति का कोई संबंद हमसे नही होता ।
शायद हम उस मानव धर्म को भुलते जा रहे है जिसके उनसे अगर हो सकता आज  हमारी जरूरत किसी ओर को है पर ये भी सत्य है कि हमे भी कभी न कभी किसी ओर की जरूरत अवश्य पड़ेगी
क्योंकि कोई भी इंसान अपने आप मे सबकुछ नही है
सिर्फ दिखावटी मानवतावादी दृष्टिकोण से कुछ नही होता जब तक कि हम धरातल पर उसका उपयोग ही ना कर पाए
इसलिये धरातल पर उतरिये ओर निभाइये अपना मानव धर्म लेकिन दिखावटी नही वास्तविक रूप में
चंद पंक्ति उनके लिए जो धनबल को इंसानियत से ऊपर रखते हौ
* “सब्र कर बन्दे इतराना यूं ठीक नही।
लाश पे मैंने तुम जैसो के बच्चे लड़ते देखे है!!*

By- Er ramdhan dholawas

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