सरकारी विध्यालयों को पीपीपी मॉडल पर देना कहा तक उचित

सरकारी स्कूलों में गरीब बच्चें पढ़ते हैं। जिन्हें भी अब सरकार पढ़ने नहीं देंगी। जब गरीब बच्चों के लिए शिक्षा के स्कूल ही नहीं रहेंगे तो कैसे और कहा पढ़ेगे। शिक्षा के सरकारी विद्यालयों में सरकार खाली पदों के भरने के लिए टीचरो की व्यवस्था सालभर नहीं करती। बिना अध्यापकों के बिना किसी पढ़ाई के छात्र कैसे परीक्षा पास करें। बिना पढ़ाई के विद्यार्थि फैल हो जाते हैं। फैल हो जाने से स्कूलों का रिजल्ट खराब हो जाता है। जिन उपलब्ध टीचरो ने पढ़ाया उनका भी रिजल्ट खराब होने से उनका स्थानान्तरण कर दिया जाता है। सरकारी अध्यापकों पर ना पढ़ाने का आरोप लगाकर बदनाम किया जाता हैं। इस तरह बिना टीचरों के विधालयो पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य वही खत्म हो जाता हैं।
इसी तरह अगर किसी सरकार में किसी विधायक या सांसद की मौत हो जाने पर 6 माह के भीतर उस सीट पर फिर से उपचुनाव करवाकर उसे भरा जाता हैं। फिर सरकारी स्कूलों में खाली टीचरो के पदों को भरने के लिए कोई निश्चित समय सीमा या नियम क्यों नहीं..? जबकि वो विधायक या सांसद पूरे 5 साल कोई काम नहीं करते।

इस तरह से सरकार सरकारी विद्यालयों की लाखों करोड़ों रुपए खर्च करके व भामाशाहों के अमूल्य सहयोग से जमीन और भवन बनाये हैं। जिनको कुछ निजी लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए अमीर और धन्ना सेठो को देकर शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह चोपट करने पर तूली हैं।

 

अगर सरकार, सरकारी स्कूलों को ही नहीं चला सकती तो फिर इस सरकार के पास काम ही क्या रह गया। जब सरकार के विधायक व सांसद कोई काम ही नहीं करते तो उनके पास फिर रहा ही क्या है?

 

सरकार के पास सरकारी काम कोई बचेगा ही नहीं तो इस संसद व विधानसभाओ को भी बंद कर देना चाहिए।

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