किस किस का दर्द लिखूँ मैं.. रीपब्लिक डे !

हर साल 26 जनवरी आते ही एक अजब सी खुशी सा अहसास होता है । हर तरफ राष्ट्रीय गीत बजते रहते हैं । स्कूलों में नन्हें-नन्हें बच्चे रंग-बिरंगे प्रोग्राम पेश करते हैं । हर किसी के हाथ में झंडा होता है । लोग अपने उन मासूम बच्चों के हाथ में भी तिरंगा थमा कर खुद भी खुश होते हैं और उसे भी खुशी का अहसास दिलाते हैं, जो ठीक से तिरंगा को संभाल भी नहीं पाता । आज यह सब सड़क-चौरोहे व कार्यक्रमों में देखकर जो खुशी मिली है उसे लफ्जों में बयां नहीं किया जा सकता । हमें आजाद होने का अहसास होता है ।

हमारे बड़े हमें यह कहानी सुनाते हैं कि किस तरह हमारे बाप-दादाओं ने अंग्रेजों से लड़ाई की, अपनी जानें गवाईं और न जाने कितने लोगों की कुर्बानी के बाद हमें यह आजादी नसीब हुई है और हम एक आजाद मुल्क में सांस ले रहे हैं । मगर ईमानदारी से देखा जाये तो यह सब चीजें कहने-सुनने में जितनी अच्छी लगती हैं प्रैक्टिकल में उतनी अच्छी नहीं हैं ।

जरा गौर कीजिये क्या वाकई में हमारा मुल्क आजाद है? क्या यहां हर कोई चैन की सांस ले रहा है? क्या हर किसी की बुनयादी जरूरतें पूरी हो रही हैं? क्या बेगुनाहों के साथ इंसाफ हो रहा है, मजदूरों को उचित मजदूरी मिल रही है, और न जाने ऐसे ही कितने सवाल हैं, जिसका सीधा सा जवाब है नहीं । इस देश में अमीर, अमीर ही होता जा रहा है और जो गरीब है वो खुद और उसके बीवी बच्चे भी दो वक्त की रोटी के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं । यहां बहुत कम लोग ऐसे हैं जो खुश है । न बच्चा खुश है न बूढ़ा खुश है और न ही जवान । बच्चा कुपोषण का शिकार है । जो किसी तरह खुदा की मेहरबानी से बचपन में ही नहीं मरता और कुछ जी लेता है वो बच्चा मजदूरी करने के लिए मजबूर है ।

सरकार के पास बच्चों की भलाई के लिए एक दो नहीं बल्कि कई योजनाएं हैं, मगर क्या इन योजनाओं का लाभ उन बच्चों को मिल रहा है. उनके लिए यह योजनाएं बनी हैं । सर्वशिक्षा अभियान के तहत सरकार ने बच्चों के किताबें और खाना का इंतजाम तो कर दिया, मगर क्या ऐसे स्कूलों की संख्या हजारों या लाखों में नहीं है, जहां बच्चों के लिए आने वाला राशन कोई और ले जाता है ।

भुखमरी पर अपनी तरह की इस पहली रिपोर्ट “स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2017” में बताया गया है कि कुपोषित लोगों की संख्या 2015 में करीब 78 करोड़ थी तो 2016 में यह बढ़कर साढ़े 81 करोड़ हो गयी है । हालांकि सन 2000 के 90 करोड़ के आंकड़े से यह अभी कम है लेकिन लगता है कि आगे बढ़ने के बजाय मानव संसाधन की हिफाजत के पैमाने पर दुनिया पीछे ही खिसक रही है । कुल आबादी के लिहाज देखें तो एशिया महाद्वीप में भुखमरी सबसे ज्यादा है और उसके बाद अफ्रीका और लातिन अमेरिका का नंबर आता है ।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भुखमरी के कारणों में युद्ध, संघर्ष, हिंसा, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा आदि की तो बात करती है लेकिन नवसाम्राज्यवाद, नवउदारवाद, मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार का ढांचा भी एक बड़ा कारण है । आखिर उसके गिनाये कारणों की जड़ में भी तो कुछ है । लेकिन उस पर संयुक्त राष्ट्र चुप है । एशिया का एक बड़ा भूभाग गरीब और विकासशील देशों से बना है । ऐसे देश जिन्हें गुलामी से मुक्ति पाए ज्यादा समय नहीं बीता है । फिर भी इसी भूभाग में ऐसे देश भी हैं जो आर्थिक मोर्चे पर बड़ी ताकतों के समकक्ष माने जाने लगे हैं, जिनकी आर्थिक क्षमता के आगे बड़े बाजार नतमस्तक हैं । इन देशों में चीन, कोरिया, जापान और भारत शामिल हैं । बल्कि इनमें से चीन तो घोषित महाशक्ति है । अन्य चार देश सामरिक तौर पर विश्व के अग्रणी देशों में आ गये हैं । अंतरराष्ट्रीय जलवे के विपरीत, एशिया में भुखमरी की दर का विस्तार बताता है कि इस महाद्वीप की सरकारों की प्राथमिकताएं क्या हैं ।

इसलिए 2015 संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक 19.4 करोड़ लोग भारत में भुखमरी के शिकार हैं । यह संख्या चीन से अधिक है । क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में लाखों की संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं? क्या यह सहीं नहीं है कि जिन बच्चों को स्कूल में होना चाहिए वो कहीं मजदूरी कर रहे हैं । जिन मासूम बच्चों के हाथों में किताब और पेंसिल होनी चाहिए वो किसी ढाबे में किसी के जूठे बर्तन धो रहा है या फिर चाय की दुकान में छोटू-छोटू की पुकार पर आया बाबू जी की आवाज लगा रहा है ।

26 जनवरी के दिन ही देख लीजिये जहां अमीरों के बच्चे रंग बिरंगे कपड़ों में स्कूल में मज़ा कर रहे होते हैं । वहीं गरीब के बच्चे उसी स्कूल के पास कूड़ा बीन रहे होते हैं । आपको ऐसे बहुत से स्कूल मिल जाएंगे जहां एक तरफ जहां कुछ बच्चे स्कूल में प्रोग्राम पेश कर रहे होते हैं । वहीं स्कूल के गेट से कुछ बच्चे अपने हाथों में कूड़ा की गठरी लिए अंदर प्रोग्राम कर रहे बच्चों को झांक रहे होते हैं ।

आखिर इन गरीब बच्चों के लिए क्या मतलब है, इस आजादी का । अंग्रेजों के जमाने में भी इन्हें रोटी नसीब नहीं थी और आज जबकि देश आजाद हो गया है तो आज भी इन्हें रोटी नसीब नहीं हो रही है । इन गरीब बच्चों के मां-बाप पहले अंग्रेजों की ग़ुलामी करते थे अब बड़े जमींदारों की गुलामी करते हैं । अब बात करें नौजवानों की, देश में सब से ज्यादा परेशान युवा नौजवान ही हैं । जो नहीं पढ़ सका वो भी, और जिस ने पढ़ाई कर ली वो भी नौकरी के लिए दर दर भटक रहा है । बेरोजगारी का यह आलम है कि पीएचडी कर चुके लोग चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं । सरकार ने एक न्यूनतम मजदूरी तय कर रखी है मगर करोड़ों की संख्या में ऐसे नौकरीपेशा हैं जिन्हें सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से कम पैसा मिल रहा है । अनपढ़ तो कई प्रकार के काम कर लेते हैं, पढ़े लिखे युवा इस दौर में कुछ अधिक परेशान हैं । उनकी समस्या यह है कि वो हर काम कर नहीं सकते और जो कर सकते हैं, उस में उन्हें नौकरी नहीं मिलती और अगर किसी तरह चप्पल घिसने के बाद नौकरी मिल भी जाती है तो तनख्वाह इतनी होती है कि एक वक्त खाओ तो अगले वक़्त का सोचना पड़ता है ।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में चार साल के एक आदिवासी बच्चे की भूख से हुई मौत हो गई । पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर के अनुसार बच्चे के पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं था । बेरोजगारी और फिर उसकी वजह से गरीबी ने लोगों का जीना हराम कर रखा है । आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं की फलां गांव में फलां व्यक्ति ने ग़रीबी से तंग आकर पहले अपने मासूम बच्चों को मारा और फिर खुद भी जान दे दी । हद तो यह है कि जिस देश में हम आजादी की खुशी मानते हैं वहां भूख से भी लोग मर रहे हैं । जरा सोचिए जिस देश में हजारों टन अनाज रखे-रखे सड़ जाता है, उस देश में भूख से किसी की मौत हो जाना उस पूरे देश के लिए शर्म की बात नहीं तो और क्या है । जिस देश को किसानों का देश कहा गया है वहां किसानों के साथ ही धोखा हो रहा है । कहीं किसानों व आदिवासियों से ज़मीन छीनी जा रही है तो कहीं किसान क़र्ज़ के बोझ से दबकर खुदकुशी कर रहे हैं । बूढ़ों की ज़िंदगी तो और भी बुरी है । जब चुनाव होता है तो यह बूढ़े तकलीफ उठा कर अपने बच्चों के कंधे पर बैठ कर वोट देने जाते हैं, मगर जब उन्हें राशन और पेंशन की ज़रूरत होती है तो उनकी आंखें ताकती ही रह जाती हैं ।

इस देश में वही आजाद हैं, जिसके हाथ में लाठी है और वही लोग मजे कर रहे हैं जो इन लाठी वालों के साथ है । हमारे देश में योजनाओं की कमी नहीं है । मगर उनमें अधिकतर या तो कागज पर ही काम करती है या फिर उनसे सिर्फ उन्हीं लोगों को लाभ होता है जो दांव-पेंच में माहिर होते हैं । जो गरीब हैं उन्हें इंदिरा आवास का घर नहीं मिल रहा और जो पैसे वाले हैं उन्हों ने कई-कई घर ले रखे हैं । गरीबों का नाम बीपीएल में नहीं है और जिनकी आय हजारों में है वो बीपीएल के मजे ले रहे हैं । गरीब आदमी एक लीटर किरोसिन के लिए तरस रहा है और अमीरों के यहां तेल भरे पड़े हैं ।

क्या आजादी का यही मतलब होता है? जब भूख से लोग मरते रहें, किसान खुदकुशी करते रहें, प्रसव के दौरान मामूली दवा की कमी से महिलाओं की मौत होती रहे, बच्चे स्कूल के बजाए चाय की दुकान पर काम करते रहें, लाखों लोग ज़िंदगी भर फुटपाथ पर सोने को मजबूर हों तो ऐसे में क्या यह कहना उचित नहीं है की बेकार है ऐसी आजादी ।

अंत में इन सब को चार पंक्तियों में मैं कुछ इस कधर कहूँ, पढ़िये !

“रोटी को रोते बच्चों का,
तन के जीर्ण शीर्ण वस्त्रों का,
चौराहे बिकते यौवन का
या सपनों का ह्रास लिखूं मैं,
किस किस का दर्द लिखूं मैं”।

– हंसराज मीणा

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