जाने क्यों फ्लॉप शो साबित हुआ- आरक्षण खत्म करने वाला भारत बंद

जाने क्यों फ्लॉप शो साबित हुआ- आरक्षण खत्म करने वाला भारत बंद

जैसा कि आप सभी को विदित है कि आज 10 अप्रैल को देश भर के सवर्ण वर्गों ने 02 अप्रैल को दलितों द्वारा किये गए भारत बंद के जबाब में भारत बंद का आयोजन रखा गया था। आज के भारत बंद के पीछे मूल भावना देश से आरक्षण को खत्म करना था। देशभर से मिली जानकारियों के अनुसार ये भारत बंद बुरी तरह फ्लॉप रहा। पूरे देश कहीं भी इसका आंशिक असर देखने को नही मिला, उसके बाबजूद मीडिया और अगड़े लोगों के संगठन इसको बड़े स्तर पर और 02 अप्रैल से भी ज्यादा असरदार मान कर चल रहे हैं। खैर प्रशासन की सतर्कता के चलते देशभर से कहीं भी कोई अप्रिय घटना की खबर नही मिली, इसके लिए पूरे देश के सुरक्षा व्यवस्था को बधाई।

आज के भारत बंद के पीछे किसका हाथ था ?

सबसे पहले ये जानना जरूरी हैं कि ये भारत बंद दलितों, मुस्लिमों और आदिवासियों के भारत बंद के जबाब में देशभर के सभी अगड़े समाजों के संगठनों ने इसका समर्थन किया था। अब ये अलग बात है कि फ्लॉप साबित होने के बाद सभी इसमें शामिल होने से पल्ला झाड़ रहे हैं।

10 अप्रैल का भारत बंद फ्लॉप क्यो हुआ ?

जैसा कि आप सभी जानते हो कि इस देश मे 85% बहुजन हैं और 15% सवर्ण। अब तक के इतिहास में कभी भी देश के बहुजनों ने भारत बंद की अकेले घोषणा नही की थी और 02 अप्रैल से पहले जितने भी भारत बंद हुए थे, उनमे सवर्णों के साथ मे बहुजन समाजो का कोई ना कोई तबका हमेशा साथ रहा था, क्योकि अब से पहले हुए भारत बंद हमेशा राजनीति और धर्मों से प्रेरित रहे थे। परंतु इस बार का भारत बंद सीधे सीधे आरक्षित वर्गों पर कुठाराघात के विरोध में था, जो किसी पार्टी या नेता के कहने से नही बल्कि आम जनता के दिलो से निकली आवाज थी। इसलिए देश की 85% जनता के पास ताकत, सत्ता और मीडिया कुछ भी नही होने के बाबजूद बड़े स्तर पर सफल रहा, वहीं आज का बंद, 15% लोगो के पास देश के सभी तंत्र मंत्र होने के बावजूद बुरी तरह फैल रहा।

जब सवर्ण जानते थे कि वे 15% ही हैं, फिर क्यो की भारत बंद की घोषणा

जैसा कि देश की सत्ता और शासन में देश के बहुजन सिर्फ नाममात्र की ही भागीदारी में हैं। देश मे सत्ता की चाबी हमेशा देश के सवर्णों के हाथ मे ही रही हैं। जैसा कि BJP ने ऐसा ही प्रयोग UP के विधानसभा चुनावो में करके देखा था, उन्होंने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिये बिना, बहुमत के साथ सत्ता हासिल की थी, उसके बाद सवर्णों को यकीन हो गया था कि जब जब बिना मुसलमानों के सत्ता हासिल कर सकते हैं, तो फिर दलित और आदिवासियों की क्या जरूरत पड़ेगी और इसी को परखने के लिए ये सब खेल खेला गया, जिसमें देश के अगडो को दलितों के हाथों मुँह की खानी पड़ी।

तो फिर अब देश के बहुजन सत्ता पर काबिज हो सकते हैं !

जी हाँ, इन आंदोलनों के बाद दलित और आदिवासियों को अपनी ताकत और संख्या का अहसास हुआ है। वैसे भी इससे पहले UP में बसपा के माध्यम से दलित अपनी राजनैतिक ताकत कई बार दिखा चुके हैं। परंतु दूरदर्शी नेतृत्व के आभाव देश के बहुजन कभी भी सही मायनों में अपनों हको के लिए एकजुट नही हो सके है। लेकिन इस बार के आंदोलनों से ये वर्ग एक बार पुनः एक दूसरे के नज़दीक आ कर अपनी ताकत को पहचान पाने में सफल हुए हैं।

किस तरह एकजुट होकर उभर पायेंगे दलितों के हितैषी ?

अभी भी ये जगजाहिर हैं कि देश के बहुजन कहने को तो 85% जनसँख्या हैं, लेकिन हकीकत इनमे से अधिकतर तबका पिछड़ा हुआ गरीब और बेरोजगार हैं। उसे अपने पेट पालन के लिए देश के 15% पूंजीपतियों पर निर्भर रहना पड़ता हैं, और ये पूंजीपति लोग अपने उद्योग, फैक्टरी और घरों में काम करने वाले देश के बहुजनों को गुलाम बनाकर उनके वोटो का सौदा कर लेते हैं, क्योकि दलित और आदिवासी समुदाय के लोगो मे शिक्षा के आभाव में जागरूकता की कमी रहती हैं और वे अपने वोट की ताकत नही पहचान पाते। जैसा कि आज 10 अप्रैल के विफल भारत बंद से साबित हो रहा है कि इन बड़े बड़े लोगो ने अपनी फैक्टरी, शोरूम तो बंद रखे, लेकिन फुटपाथ पर छोटी छोटी दुकाने करने वाले अधिकतर बहुजन ही होते हैं और इसी बार बहुजनों ने सवर्णों के भारत बंद में साथ क्या नही दिया, उनकी सत्ता और मीडिया धरी रह गई।

इसका मतलब अब अँगड़े वर्ण हार मान लेंगे, दलितों के साथ समानता से रहेंगे ?

तो मेरा जबाब है कि कतई नही । बल्कि ये अब बहुजनों को तोड़ने का काम करेगें। क्योकि ये लोग अच्छे से जानते हैं कि यदि बहुजन एकजुट होकर किसी एक पार्टी के साथ हो जाये, तो फिर देश के अंदर दूसरी कोई भी पार्टी सौ बरसों तक सत्ता में नही आ सकती, इसलिए ये वर्ग अब दलित और आदिवासियों के वजुददार नेताओं को बहलाकर, लोभ लालच देकर सवर्णों के हको में बोलने के लिए बाध्य करेगे, और ऐसे नेताओं के माध्यम से बहुजनों को एकजुट होने से रोकने की सभी कोशिश की जाएगी। हो सकता हैं कि अब ये अँगड़े समाज अपनी सत्ता और रुतबे के माध्यम से दलित समाज के महापुरुषों के नाम पर योजनाये बनाने का ठोंग करे, अब ये लोग बाबा भीमराव अम्बेडकर और ज्योतिबा फुले के नाम से दलितों को बरगलाने का भी सडयंत्र रचे।

अंत मे एक बात कहूंगा अब देश के आम लोग अपनी ताकत को पहचान चुके है, ऐसा बिल्कुल नही है कि सवर्ण और दलित समुदायों के सभी लोग आपस मे एक दूसरे से जलते हो,बल्कि अधिकतर लोग से भाईचारे से रहते हैं, परंतु कुछेक पूंजीवादी और राजनैतिक तत्व हमे भाईचारे से रहता हुआ देखना नही चाहते, क्योकि वे जानते हैं देश के फूट में ही, वे देश के अंदर अपनी लूट जारी रख सकते हैं।

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