आदिवासियों को खदेड़ने के लिए बनवाई गई सरदार पटेल की मूर्ति !

यह कैसा लोकतंत्र है?

सरदार पटेल ने राष्ट्र निर्माण का ज्यादातर काम दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद में रहकर किया. यहीं वे आवास हैं, जहां वे रहे.

क्या यह अच्छा न होता कि गुजरात के सैकड़ों आदिवासियों को गांव-जंगल से उजाड़कर सरदार पटेल की मूर्ति लगाने की जगह… ….दिल्ली में वसंत विहार या ग्रेटर कैलाश या मुंबई में कफ परेड, नरीमन प्वांट या बांद्रा या जुहू में दो-तीन हजार अमीरों की कोठियां तोड़कर वहां पटेल की मूर्ति लगती?

देश सबका है, लेकिन जमीन की कुर्बानी सिर्फ आदिवासी दे. और विरोध करे तो उसे नक्सली बताकर मार भी दो.

नर्मदा / सरदार सरोवर / विश्व की सर्वोच्च प्रतिमा / गूँजती राष्ट्र-महिमा बनाम मौन आदिम मर्सिया

नर्मदा की तीर पर सरदार वल्लभभाई पटेल की विश्वोच्च्तम प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री महोदय द्वारा आज किया गया. एक दृष्टि से यह भारत के लिए गौरव की बात हो सकती है दूसरी और स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल के पौत्र ने इस समारोह में सम्मिलित होने से यह कहकर मना कर दिया की प्रतिमा पर व्यव राशि जन-धन का दुरूपयोग है, इसे जन-कल्याण में लगाना चाहिए था. सरदार सरोवर के निर्माण के कारण जिन लाखों लोगों का विस्थापन हुआ उनमें से अधिकांश आदिवासी थे, जिनका न पुनर्वासन हुआ और न ही उन्हें पर्याप्त मुआवज़ा दिया गया. अनावरण से पूर्व प्रभावित लोगों ने यह मांग उठाई भी, किन्तु किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. जब मेधा पाटेकर के नेतृत्व में इस बाँध के निर्माण का पूरा विरोध हो रहा था, तब सन 2001 के अक्टूबर माह में मैंने एक कविता लिखी थी जो मेरे संग्रह ‘सुबह के इंतज़ार में’ (2006) में शामिल है. मैं नहीं कह सकता आज यह रचना कितनी प्रांसगिक है, किन्तु मेरा मन इसे यहाँ लिखने का बन गया है!

सरदार सरोवर में डूबा आदिवासी भविष्य

मैंने खूब सुना है इन दिनों, सरदार सरोवर परियोजना के बारे में,मैं शौकिया गया था,उस बाँध को देखने

मैं इतना बहादुर था कि डरा नहीं,जहरीले साँप-बिच्छुओं, जंगली जानवरों और नागफणी के कुंजों से ताकते भूत-प्रेतों से, पर- मैं इतना कायर व कमजोर था कि रात का बुर्का ओढ़कर चुपचाप अकेला पहुँचा था वहाँ

मैं इतना फुर्तीला और साहसी था, जो चढ़े जा रहा था मकड़-मानव की तरह -बाँध की ऊँची, सख्त और मोटी दीवार पर, इतना पिलपिला कि,अपनी हर सम्भावित असावधानी से आशंकित

बाँध की गहराई नापने के लिए,मैंने छलाँग लगाई चोटी से एक अनुभवी गोताखोर की तरह,जैसे किसी साधारण मेंढ़क ने, छपाक मारी हो लम्बी और बेआवाज

दोनों हाथों को आगे की ओर खींचे,सधी हथेलियों का फाल बनाकर,भाले की तरह धँसा जा रहा था-
नर्मदा के गहरे, काले और सघन पानी की परतों को चीरता हुआ

जब मैं बहुत नीचे चला गया,मुझे लगा जैसे
हाथ भर पानी भी कोस के बराबर हो,पतले से बहुत गाढ़ा बनता हुआ

नीचे ठेठ तल में नजर आए
भारी व नुकीली चट्टानों में फँसे हुए,वक्त के खूँखार पंजों से नोंचे-खरोंचे,ताजा जीवाश्म,स्मृतियों की धरती पर,मौन, मरघटी, भूतहा माहौल

मैंने महसूस किया जैसे,अभी-अभी हुआ हो सामूहिक कत्ल, किन्हीं मासूम, बेगुनाह और अल्हड़ मानव समूहों का, जिनके साथ एक लम्बे इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और सपनों का

दम घुटने लगा मेरा पानी के उस तहखाने में,
वजह, पानी का दबाव या डूबी स्याह रात नहीं
उस सुबह की चकाचैंध थी,जो अभी होने वाली थी
और जिसकी कोई किरण -नहीं पहुँचती गहरे में दफनाए इन ध्वंसावशेषों तक

मैंने घबराकर उल्टी छलाँग मारी और आ गया बाँध की दीवार पर

सूरज करीब उगा हुआ बाँध के बाहर सामने दूर-दूर तक सुनहरी ताजा धूप,

मगर,भीतर विराट जलराशि परबिखरा था,खून का ताजा और तरल रंग!
(अक्तूबर, 2001, हरिराम मीणा)
(राष्ट्र और राष्ट्र-नायकों से क्षमा माँगते हुए)

मोदी गांधीवादियों को गिरफ़्तार करके करेंगे सरदार पटेल की प्रतिमा का अनावरण ?

गुजरात में आदिवासियों, किसानों और आमजन के लिए संघर्षों का नाम प्रसिद्ध गाँधीवादी नीता महादेव (अध्यक्ष, लोकसमिति, गुजरात) और मुदिता विद्रोही (लोकसमिति, गुजरात और संयोजक, राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट) सहित तकरीबन 90 कार्यकर्ताओं को गुजरात पुलिस ने बिना किसी महिला पुलिस की उपस्थिति में केवड़िया जिले के राजपीपला गाँव से गिरफ़्तार कर लिया है। यह वो ही जगह है जहाँ राष्ट्रीय आंदोलन हड़प अभियान के तहत नरेंद्र मोदी सरकार कल सरदार पटेल की प्रतिमा का अनावरण करने जा रही है। ये लोग स्टेचू ऑफ लिबर्टी के आयोजन के विरोध में दो दिन से अनशन पर बैठे स्थानीय आदिवासियों के साथ समर्थन जताने जा रहे थे. विरोध के डर से पूरे जिले में हजारों की तादात में पुलिस को तैनात कर दिया गया है। जगह जगह छापे मारे जा रहे हैं। गाँधी के शिष्य सरदार पटेल की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए प्रख्यात गाँधीवादी चुन्नीलाल वैद्य की बेटी और नातिन की गिरफ़्तारी मोदी के अहंकार का परिणाम है.

कोई घोटाला तो नहीं

यूनिटी स्टेच्यु बनने से पहले दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति चीन के हेनान प्रांत के लुशान में बनी तथागत बुद्ध की प्रतिमा थी. इसकी उंचाई 128 मीटर यानी 419 फुट है. इससे बनाने पर 180 लाख डॉलर यानी 128 करोड़ रुपए खर्च हुए.स्टैच्यु ऑफ यूनिटी 182 मीटर यानी 597 फुट ऊंची है. इस पर 3,000 करोड़ रुपए का खर्चा आया है.

सरदार पटेल की मूर्ति का बड़ा हिस्सा चीन के TQ Art Foundry में बनी है जो Jiangxi Toqine Company, Nanchang का हिस्सा है. ( देखें इंडियन एक्सप्रेस में 20 अक्टूबर, 2015 को छपी रिपोर्ट, शीर्षक है – “Statue of Unity to be ‘made in China’, Gujarat govt says it’s contractor’s call.”

हिसाब गड़बड़ नहीं लग रहा है क्या? इसमें कोई घोटाला तो नहीं है?जांच होनी चाहिए,

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