मोदी और राहुल गाँधी, दोनों को नकारा गुजरात की जनता ने

जैसा कि आप सभी टीवी स्क्रीन पर देख रहे होंगे कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों में नरेंद्र मोदी जी की बीजेपी पार्टी दोनों ही जगह सत्ता पर काबिज होने में सफल होती दिख रही है लेकिन हम हमारे नजर से देखें तो यह ना तो बीजेपी की सफलता है ना ही कांग्रेस की हार क्योंकि जिस तरह से हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने पद कोई छवि को दांव पर लगाते हुए जिस तरह की राजनीतिक प्रचार किया उससे गुजरात के चुनाव को एक टकराव का अखाड़ा बना दिया गया था जहां पर बीजेपी की 150 से कम सीटें आना नरेंद्र मोदी जी के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता क्योंकि अब 2019 ज्यादा दूर नहीं है बेशक भारतीय जनता पार्टी गुजरात में अपने 22 साल के शासन को बचाने में कामयाब जरूर हो गई है लेकिन राहुल गांधी के प्रचार ने पहली बार यह साबित कर दिया कि राहुल गांधी जी भी सकारात्मक राजनीतिक करके नरेंद्र मोदी जी के पैरों तले की जमीन हिला सकते हैं। और ऐसा कुछ होता हुआ भी देखा लेकिन कांग्रेस की इस आंशिक सफलता को राहुल गांधी की जीत भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि राहुल गांधी जी का सपना गुजरात में 22 साल से चले आ रहे कांग्रेस के अकाल को समाप्त करना था और वह उसमें कामयाब नहीं हो पाए वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी का सपना 150 लीटर लाने का था वह भी उस में कामयाब नहीं हो पाए मतलब खुले में कहा जाए तो

जनता ने इन दोनों ही नेताओं को नकार दिया है क्योंकि एक झूठ और वादों की राजनीति कर रहा है तो दूसरी तरफ एक नेता वंशवाद की राजनीति को आगे बढ़ा और जनता समझ रही है|

यह चुनाव चुनावी मुद्दों से एकदम दूर होकर सिर्फ और सिर्फ आपसी टकराव जातिवाद और धर्मवाद के मुद्दों को लेकर लड़ा गया था जिस गुजरात मॉडल की बात नरेंद्र मोदी जी पूरे देश से लेकर अमेरिका तक करते हैं उस गुजरात मॉडल की बात उन्होंने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी नहीं कि इससे साबित होता है कि गुजरात मॉडल कुछ भी नहीं देश के साथ एक छलावा है और उस छलावे से पूरे देश को चलने की जो कोशिश भारतीय जनता पार्टी के अगुवाई में नरेंद्र मोदी जी कर रहे हैं उस से देश का विकास नहीं बल्कि देश में सामाजिक असमानता और डेटा को बढ़ावा मिल रहा है बेशक चुनावों में कोई भी पार्टी हार और जीत एक लोकतंत्र की परंपरा है लेकिन उस जीत और हार के लिए हमारे संवैधानिक पदों को की गरिमा को भंग करना हमारे देश के भविष्य के लिए खतरनाक साबित होगा

साल 2012 के चुनावों में बीजेपी को 39 फीससी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 9 फीसदी। यानी कांग्रेस बीजेपी से महज 9 फीसदी वोटों से पीछे थी। 2017 के एग्जिट पोल के मुताबिक बीजेपी को 47 फीसदी वोट मिलने की संभावना है जबकि कांग्रेस को 42 फीसदी वोट की। यानी राहुल गांधी पार्टी और संगठन को आमजनों तक पहुंचाकर और उनमें कांग्रेस के प्रति फिर से मोह जगाने में कामयाब रहे हैं। यही वजह है कि इस बार कांग्रेस बीजेपी से महज पांच फीसदी वोट से पीछे रह सकती है। अगर दोनों पार्टियों के वोट शेयर और सीटों को देखा जाए तो अब तक कांग्रेस को 1985 में सबसे ज्यादा 149 सीटें (55.6%) मिली थीं। उधर, बीजेपी के खाते में 2002 में 49.9% वोट शेयर के साथ पहली बार सबसे ज्यादा 127 सीटें आई थीं।

बिना हार के डर के लड़ते दिखाई दिये थे राहुल गांधी

नरेंद्र मोदी जी को बीजेपी की जीत का सौदागर कहा जाता है इनके बारे में कहा जाता है कि जहां-जहां नरेंद्र मोदी के पैर पड़ते जाते हैं वहां वहां पर बीजेपी जीती जाती है और इतने बड़े नेताओं की फौज में नरेंद्र मोदी जी वन मैन आर्मी दिखाई देते हैं जिनके अकेले के चुनाव प्रचार की वजह से ही बीजेपी गुजरात में अपनी सत्ता बचा पाने में कामयाब हो पाई है, नहीं तो यह साफ नजर आ रहा था कि नरेंद्र मोदी जी चुनावी मैदान में नहीं आते तो BJP भी कहीं नजर नहीं आती ।

लेकिन इनके सामने राहुल गांधी जी भी हारकर बाजीगर की तरह उभरकर सामने आए हैं जिन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद की गद्दी संभालते ही बीजेपी के सबसे बड़े गढ़ गुजरात में कांग्रेस को एक बार फिर से खड़ा करने की एक कामयाब कोशिश की है और यह राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए भविष्य का अच्छा संकेत साबित हो सकता है ।यहां पर हम कांग्रेस की हार के बावजूद भी राहुल गांधी जी और कांग्रेस को बधाई देना पसंद करेंगे और दूसरी तरफ बीजेपी ने बहुमत से सरकार बनाई उस के लिए उन्हें शुभकामनाएं और साथ में ही आगामी चुनाव और 2019 का चुनाव ना लड़कर 2024 की बात करने वाली बीजेपी के लिए एक चेतावनी भी समझने की हिदायत देंगे।

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