युवाओं को तार्किक शिक्षा और प्रगतिशील वातावरण की जरुरत है, मंदिरों की नहीं

जिस स्थान पर ससम्मान प्रवेश करना वर्जित हो, उसमें जबरन प्रवेश करना भी पागलपन है। इससे आपके लिए सम्मान की सहज सामाजिक स्वीकृति तो मिलने से रही। ऐसी ऐसी स्थिति में दो ही रास्ते उपयुक्त लगते हैं- या तो उस स्थान का बहिस्कार करो या फिर सामाजिक संकीर्णता के विरुद्ध मानसिक जाग्रति लाने के लिए आन्दोलन करो।

जबरन मंदिर में प्रवेश से क्या हासिल होगा ? वहां आप किसी पुजारी के इशारे पर नतमस्तक होकर मानसिक गुलामी को ही पुनर्जीवित करोगे और प्रगतिशीलता के बजाय अंधभक्ति का ही रास्ता पकड़ोगे। मानाकि आपके लिए धर्म-कर्म और ईश्वर भक्ति जरुरी है, लेकिन इसके लिए आप किसी ऐसे स्थान को भी चुन सकते हैं जहाँ भक्ति के लिए सम्मानजनक सहज वातावारण हो। लेकिन आप वहीँ जाना चाहते हो, जहाँ आपके लिए केवल तिरस्कार है, तो फिर इसमें गलती अपमान करने वाले की नहीं आपकी है। क्योकि आपका धर्मभीरु और कुंठित व्यवहार न्योता देता है कि आपका अपमान हो।

रही बात डॉक्टर साहब की। कल ही उन्होंने E tv पर कहा है कि वे संघ में आस्था रखते हैं और आज भी गुरु दक्षिणा देते हैं। अर्थात वे संघी विचार में दीक्षित हैं, इसलिए उनसे प्रगतिशील परिवर्तन के लिए संघर्ष की उम्मीद तो कदापि नहीं की जा सकती। बेशक डॉक्टर साहब जन नेता हैं और आदिवासी मीणाओं में सबसे ज्यादा विश्ववसनीय भी। लेकिन उनके राजनीतिक व्यवहार से संघ की राजनीती को ही फायदा पहुंचा है। इसलिए डॉक्टर किरोड़ी का यह मंदिर आन्दोलन भी संघ के एजेंडे के अनुकूल ही लगता है। पहले भी उनके द्वारा मीणा समुदाय में “मीन भगवान के मंदिर निर्माण” की मुहीम को प्रोत्साहित करने के कृत्य ने न केवल मीणा समुदाय को आदिवासी पहचान और स्प्रिट से विमुख किया है, बल्कि समुदाय को जड़ता की तरफ ही धकेला है।

हर बार असली सवाल यह ही उठता है कि डॉक्टर किरोड़ी आदिवासी और दलित नौजवानों की बेरोजगार फ़ौज के लिए क्या भविष्य देखते हैं, और उनकी राजनीति में उन नौजवानों के लिए क्या कार्यक्रम हैं ? डॉक्टर साहब अगर नौजवानों के लिए सुबह- शाम मंदिर की घंटी बजाना ही बेहतर भविष्य है तो फिर जबरन मंदिर में प्रवेश की राजनीति छोड़कर उस सामाजिक बदलाव के लिए राजनीति कीजिये, जिसमें आदिवासीयत और आदिधर्म के प्रति स्वाभिमान जाग्रत हो तथा दलित शेष समाज के साथ सहज सम्मान भाव से रह सकें और बिना संघर्ष के मंदिर में जाकर घंटी भी बजा सकें। लेकिन ऐसा बदलाव भी सामाजिक चेतना के स्तर पर ही आएगा, जिसके लिये डॉक्टर साहब! बेहतर तार्किक शिक्षा और प्रगतिशील वातावरण की ही जरुरत होगी, मंदिर की नही ।

साभार शिवचरण बोहरा

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