फिर फिर रावण…आख़िर कब जलेगा रावण

वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार हरिराम मीना जी की कलम से—

फिर फिर रावण!

अब से करीब 30 बरस पहले की बात है. मेरे गाँव की लाईब्रेरी में मुझे एक पुस्तक मिली जिसका शीर्षक था ‘रावणायण’ वह कोई उपन्यास था जिसके लेखक का नाम मुझे याद नहीं है. उस पुस्तक की कथावस्तु में रावण की लंका, दुर्ग, सेना, शस्त्रास्त्र, नौका, वायुयान, कला, मनोरंजन के साधन इत्यादि का विस्तार से वर्णन किया हुआ था.

आनंद नीलकंठन की पुस्तक Asura: Tale of the Vanquished जिसका हिंदी संस्करण ‘असुर : पराजितों की गाथा’ से मेरा परिचय हाल ही में हुआ है. इस उपन्यास में असुर गाथा के बहाने रावण की कहानी कही गयी है. कहा जाता है कि रावण वेदों का ज्ञाता और शिवभक्त था. सीता हरण की बात भी सामने आती है, लेकिन रावण का बचपन कैसा था, जंगल में अभावों में पला वह बालक सोने की लंका तक कैसे पहुंचा? इन समस्त प्रश्नों का उत्तर इस पुस्तक में देने का प्रयास किया गया है. रावण के मुख से कहलवाया गया है कि –

‘यदि मैंने अपने दिमाग की सुनी होती तो शायद परिणाम कुछ और होते परन्तु जो भी हो, मैं भी मोहमाया में बंधा जीव ही तो था. मैं भी आवेगों के पाश से मुक्त नहीं था. मैं एक रावण की भांति जीया और रावण की भांति ही मरूँगा. मैं राम बनने की इच्छा नहीं रखता और न ही मुझे कोई सम्पूर्ण पुरुष अथवा कोई ईश्वर बनना था; मेरे देश में पहले से ही देवताओं और ईश्वरों का कोई अभाव नहीं था. इसमें अभाव था तो केवल मनुष्यों का- ऐसे लोगों का, जो सही मायनों में केवल मनुष्य ही हों.’

ज़ाहिर है रावण का सरोकार मनुष्य के निर्माण से है जो एक बहुत बड़ा दार्शनिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न है. इसी की खोज में हमारी समस्त ज्ञान परंपरा अग्रसर होती रही है. मनुष्य से तात्पर्य है मनुज योनि से न होकर अच्छे मनुष्य से है. यहाँ रावण न किसी आकाशी स्वर्ग में जीना चाहता है और न किसी पाताली सुरंग में. वह धरती के यथार्थ के साथ जीवन को देखता है. रावण को लेकर और भी बहुत सा साहित्य रचा गया है. इसी तरह बहुतेरी फ़िल्में भी रावण को केंद्र में रखकर निर्मित हुई हैं. इस सबकी चर्चा फिर कभी.
बहरहाल इन दो कथा-कृतियों के क्रम में दो फिल्मों पर बात की जा सकती है, जिनमें एक है ‘रावण’ (1984). प्रमुख भूमिका में स्मिता पाटिल, गुलशन ग्रोवर हैं. लिंक रोल ओम पुरी का है. नारी पात्र के रूप में सीता के स्थान पर गंगा को अवतरित किया गया है. रामकथा में सीता की पहचान संकट में रही और इस फ़िल्म में ‘गंगा’ की. सीता हो अथवा गंगा हमारे देश में सभी ख़तरे में हैं! अंतिम दृश्य में दशहरा वाले रावण को नहीं जलने देने का संकल्प लेती हुई गंगा अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देती है. दूसरी फ़िल्म मणिरत्नम की ‘रावण’ (2010) है. फिल्म शुरू होती है रामायण के उस किस्से से जिसमें सीता का रावण अपहरण कर लेता है. बीरा (अभिषेक बच्चन) जिसे हम रावण कहें या रॉबिन हुड (फिल्म में भी यह प्रश्न किया गया है) देव (विक्रम) की पत्नी रागिनी (ऐश्वर्या राय) का अपहरण कर उसे घने जंगलों में ले जाता है. विक्रम को हम राम के किरदार से जोड़ सकते हैं, जो एक हनुमाननुमा किरदार (गोविंदा) और अपनी सेना (पुलिस वाले) के साथ अपनी सीता को छुड़ाना चाहता है.
मणिरत्नम दक्षिण भारत के फिल्मकार हैं जहाँ रावण की छवि खलनायक की नहीं होकर नायक की रही है. इसीलिए फ़िल्म में रावण द्वारा सीता के अपहरण का कारण उसकी बहन के साथ पुलिसवालों द्वारा किया गया दुष्कर्म एवं तज्जन्य मृत्यु है. रावण सीता के साथ कोई दुष्कृत्य नहीं करता. फ़िल्म में कुलमिलाकर रावण को नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. दूसरी ओर जिसे वह राम समझ कर भगवान का दर्ज़ा देते रहे हैं वह कहीं न कहीं ग़लत होता है.
रावण को लेकर कुछ शंका-समाधान:
• क्या रावण के दस शीश थे?
कुछ विद्वानों का मत है कि मायावी होने के कारण वह दस सिर होने का भ्रम पैदा कर देता था, इसी कारण उसे दशानन कहते हैं. एक अन्य मतानुसार रावण छह दर्शन और चारों वेद का ज्ञाता था, इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था. दसकंठी कहे जाने के कारण प्रचलन में उसके दस सिर मान लिए गए. जैन शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण के गले में बड़ी-बड़ी गोलाकार नौ मणियां होती थीं. सभी नौ मणियों में उसका सिर दिखाई देता था जिसके कारण उसके दस सिर होने का भ्रम होता था.
• आर्य-अनार्य संग्राम श्रृंखला के कारण रावण को खलनायक बना दिया गया!
आचार्य चतुरसेन द्वारा रचित बहुचर्चित उपन्यास ‘वयम् रक्षामः’ तथा पंडित मदन मोहन शर्मा शाही द्वारा तीन खंडों में रचित उपन्यास ‘लंकेश्वर’ के अनुसार रावण शिव का परम भक्त, यम और सूर्य तक को अपना प्रताप झेलने के लिए विवश कर देने वाला, प्रकांड विद्वान, सभी जातियों को समान मानते हुए भेदभावरहित समाज की स्थापना करने वाला था. सुरों के खिलाफ असुरों की ओर था रावण. रावण ने आर्यों की भोग-विलास वाली ‘यक्ष’ संस्कृति से अलग सभी की रक्षा करने के लिए ‘रक्ष’ संस्कृति की स्थापना की थी. यही ‘रक्ष’ समाज के लोग आगे चलकर राक्षस कहलाए.
• रावण संहित में रावण के संपूर्ण जीवन की जानकारी है. इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियों का भंडार है.
• क्या रावण की लंका सोने की थी?
श्रीलंका का प्राचीन नाम ताम्रपर्णी था जिसका अर्थ होता है तांबा का पत्ता या थाल. निश्चित रूप से उस अंचल में तांबा व कांस्य जैसे खनिजों का विपुल भंडार रहा होगा. इन खनिजों का उपयोग भवन निर्माण में किया जाता होगा. इसीलिए वह नगर ताम्रवर्णी से स्वर्णमयी कहलाया होगा.
• रावण की विनम्रता !
राम ने जब रामेश्वरम् में ‍शिवलिंग की स्थापना की थी तब विद्वान पंडित की आवश्यकता थी. रावण ने इस आमंत्रण को स्वीकारा था. दूसरी और राम-रावण के युद्ध के दौरान रावण ने लंका के ख्यात आयुर्वेदाचार्य सुषेण द्वारा अनुमति मांगे जाने पर घायल लक्ष्मण की चिकित्सा करने की अनुमति सहर्ष प्रदान की थी. रावण ने दो वर्ष सीता को अपने पास बंधक बनाकर रखा था, लेकिन उसने भूलवश भी सीता को छूआ तक नहीं था.
हम प्रति वर्ष दशहरा पर रावण के पुतले का दहन करते हैं. फिर भी समाज से बुराईयों का नाश तो दूर उनके कम होने के स्थान पर उनमें वृद्धि होती जा रही है. क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि जिस रावण में अनेकानेक गुण थे, हम उन गुणों का उत्सव मनाकर मानवीय मूल्यों तथा ज्ञान-विज्ञान के सूत्रों की स्थापना करें ताकि एक बहतर दुनिया का निर्माण किया जा सके.

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