करवा चौथ पर ही क्यो याद आता हैं चाँद

जब करवा चौथ आती है / मुझे पत्नी की भूख से ज्यादा चाँद की चाहत सताती है. चाँद दिखे बिना पत्नी व्रत नहीं खोल सकती और जब तक व्रत नहीं खोलती तब तक उसे रोटी नसीब नहीं होती. नज़ीर अकबराबादी (1740-1830) ने सबसे पहले चाँद में रोटी देखी और यह कहा-

‘जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ / फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँ / ……….हम तो न चाँद समझें न सूरज हैं जानते / बाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ .

इसके बाद तो ‘इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ.’ (पीयूष मिश्र, फिल्म ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’) ‘आज फूटपाथ पर लेटे हुए, ये चाँद मुझे रोटी नज़र आता है!’ (गुलज़ार) ‘वे खोजे महबूब चाँद में हाल जहाँ माकूल है रोटी में जो चाँद निहारे क्या भूखों की भूल है.’ (श्यामल सुमन) ‘आसमाँ की थाली में चाँद एक रोटी है.’ (ज़ावेद अख्तर) ‘धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे / उद्गार–चिह्नाकार—मीनार / मीनारों के बीचों-बीच / चांद का है टेढ़ा मुँह!!’ (मुक्तिबोध)

‘आपको बीमारी है : आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं और बढ़ते हैं तो बस यानी कि बढ़ते ही चले जाते हैं…..’ (शमशेर) ‘चाँद इमारतों के पीछे छटपटा रहा था.’ (हेमंत कुकरेती)

अब मेरी आफ़त है कि महानगर में कहाँ खोजूं चाँद ?

बचपन के कोरे कागज़ पर अनजाने में कई दफ़ा ऊल-जलूल क़िस्म के संस्कार ना जाने कहाँ से अंकित हो जाते हैं. मेरी धर्मपत्नी के दिलो-दिमाग में कई संस्कार ऐसे ही जड़ जमाये हुए हैं. मैंने मेरी वैज्ञानिक समझ के तरकश का हर तीर उन संस्कारों को भेदने के लिये चला लिया लेकिन संस्कार बिंधने की जगह अपने तने को और मोटा व मजबूत करते रहे. उनमें से एक संस्कार है चौथ का व्रत. अब साल बारह महीनों में एक गुणा दो के हिसाब से चौथ की तिथियाँ अर्थात चतुर्थियाँ हो जाती हैं चौबीस. व्रत की दृष्टि से इन्हें आधी कर दें यानी कि बारह. बारह इसलिये कि व्रत किया जाता है कृष्ण पक्ष की चतुर्थियों का. करवा चौथ स्पेशल तिथि है. पतियों की सलामती के लिये अधिकांश महिलाएं करती हैं, केवल इसी कारण मैं मेरी वैज्ञानिक चेतना और करवा चौथ के व्रत के बीच समझौता करने को बेमन से राजी होता रहा.
मेरी दिक्कत करवा चौथ या शेष बची ग्यारह चौथों के व्रतों के साथ न होकर चाँद देखकर व्रत को तोड़ने की जिद से पैदा होती है. यह जिद व दिक्कत भी चाँद की वज़ह से. वह चाँद जिसका मैं हमेशा से कायल रहा हूँ वही चाँद यहाँ खलनायक की भूमिका निभाने लगता है. इसमें भी चाँद का तनिक दोष नहीं. यहाँ आड़े आता है जयपुर महानगर जिसमें मैं अर्सा से रह रहा हूँ. जबसे नगर से महानगर बनने की कसम खायी है इस शहर ने तभी से चाँद का इससे झंझट शुरू होने लगा और वह लोगों को दिखने न दिखने की जिद करने लगा. मेरी दिक्कत यहीं से आरंभ होती है.
पिछली चौथ का दिन शांति से गुज़र गया. संध्या बूढी हो रही थी. रात का आगाज़ हो चुका था. रात के साढ़े नौ बज गये. जैसे ही याद आयी धर्मपत्नी के व्रत की तो लिखना-पढ़ना एवं देर शाम के अन्य ज़रुरी काम छोड़ चाँद का ध्यान करने लग गया. ध्यान करता करता मकान की छत पर जा पहुंचा. चाँद आसमान में नज़र नहीं आया. चाँद को उगना था पूरब दिशा से जिस ओर आड़े आ रही थी एक चार-मंजिला ईमारत. चाँद कोई दो घड़ी ऊपर चढ़े तो उसके नज़र आने की संभावना बने. वापस नीचे आया. लॉबी में रखे सोफ़ा पर लेटी हुई पत्नी को देखा. उसका चेहरा दिन भर की भूख व थकान से मुरझाया हुआ था. कब की खा-पीकर टी.वी. का कलर चैनल देख रही होती लेकिन चाँद का क्या करें?

मेरी नज़र गयी दीवार पर टंगे कलेंडर की तरफ. चाँद के उगने का समय छपा हुआ था नौ बजकर उनसठ मिनट. नौ देखकर तसल्ली हुई. उनसठ देखते ही माथा ठनका. इसका साफ़ मतलब था कम से कम साढ़े दस. चाँद के चक्कर में एक घंटा और इंतजार करना पड़ेगा.

मैंने पत्नी को कहा, ‘चलो छत पर. मैं तुम्हें चाँद दिखता हूँ.’
‘क्या दिख गया?’ मेरी ओर बड़े प्यार से देखती वह उत्सुकता से बोली.
‘हाँ, तुम काफ़ी परेशान लग रही हो. चलो देखते हैं. अब तो चाँद निकल ही आया होगा.’
मैं उसे लेकर इकमंज़िला छत पर गया. चाँद को देखने का प्रयास किया. अमानीशाह नाला के किनारे बने आठ माले कोम्पलेक्स की सातवीं मंज़िल की दक्षिणी दीवार पर चाँद तो नहीं, बिजली की रोशनी का चांदा (प्रतिबिम्ब) नज़र आया जो दूर से चाँद का भ्रम पैदा करने जैसा लगा.
‘वो देखो, चाँद दिख गया. हल्के बादलों में है ना. इसलिए धुंधला सा दिख रहा है.’ बाहर से मैंने संदेह से परे चाँद का चश्मदीद गवाह बनने का दावा किया. मन के भीतर पोल खुलने के अंदेशा को छुपाते हुए.
‘हाँ, लग तो रहा है चाँद ही है.’ कहते हुआ पत्नी संतुष्टि के करीब थी.
‘मैं पूजा की थाली लेकर आती हूँ.’
‘वह कहाँ है?’ मैं झुंझलाया. मेरी झुंझलाहट सहज थी.
‘अजी. वो ऊपरवाली छत पर रख दी थी ना यह सोचकर कि चाँद तो वहीँ से दीखेगा. मैं अभी लेकर आती हूँ.’ कहती हुई वह सीढियाँ चढ़ने लगी. मैं भी उसके पीछे पीछे छत पर तुरंत गया यह सोचता हुआ कि इसने अगर चाँद को वहां से देखा तो कुछ नज़र नहीं आनेवाला. ज़ाहिर है चाँद को तो दस बजे से पहले किसी हालत मैं नहीं दिखना था.
‘नहीं जी, मैं यहीं से पूजूंगी चाँद को. वो क्या है कि नीचेवाली छत पर बच्चे घूमते हैं ना. अर्ध्य सामग्री पर पैर रख देंगे तो अच्छा नहीं होगा.’ पत्नी द्वारा पूजा-स्थल ऊपरवाली छत को ही रखने के इस आइडिया का जोर का धक्का मुझे धीरे से लगा.
मैंने मन में सोचा, ‘अब यहाँ चाँद कहाँ से लाऊं?’
कुल मिलाकर साढ़े दस बजे चाँद को बड़ी मशक्कत के बाद खोज सका. और वह भी अमानीशाह के नाले के निकट जाकर. अन्य किसी पॉइंट अथवा एंगल से मैं चाँद को नहीं देख सकता था.

मैंने बड़े सम्मान से धर्मपत्नी से कहा कि ‘बहुत देख लिया चाँद को गाँव में. अब छोड़ो ये चाँद का चक्कर. यहाँ इस महानगर में चाँद-सितारे नहीं देख पाओगी. और यूँ भी ये चाँद-वांद के झंझट ज़वानी के शौक होते हैं. मेरी सलामती की भी अब ज्यादा परवाह करने की ज़रूरत नहीं. बुढ़ापे की उम्र वैसे भी कम ही होनी चाहिए.’ नयी पीढ़ी की औलादों का क्या भरोसा?’
गनीमत है कि आज चाँद के निकलने का समय सवा आठ के आस पास का बताया गया है.

Facebook Comments