पाँचवी अनुसूची की सख़्ती से अनुपालना करवाने के लिए सभी आदिवासियों को एकजुट होना ही पड़ेगा

सेवा जोहार  भाइयो आज आदिवासी समुदाय  का अस्तित्व जाति,संगठन व धर्म में बंट गया है। हमें अब एकजुट होने की आवश्यकता है। आज हमारे समुदाय का अस्तित्व खतरे में है।चारो और समस्याए ही समस्याए है।

पूरे देश  के आदिवासी अलग-अलग ग्रुप संगठन व समाजो  में बंटे हैं, जिन्हें आगे बढ़ने की आवश्यकता है। पूरे देश में साढ़े 11 करोड़ आदिवासी विभिन्न विचारधाराओं में बंटकर रहते हैं।  आदिवासी समुदाय के बीच गरीबी ओर भुखमरी व्याप्त है।जल जंगल व जमीन की लूटपाट मची है। कुछ उपेक्षापूर्ण वातावरण में रहे हैं और कुछ बदलते परिवेश में समय के साथ आर्थिक बदलाव पर गंभीर हैं। जब तक देश के सभी आदिवासी एक संकल्प के साथ एकजुट नहीं होते, तब तक आदिवासी समुदाय  का विकास संभव नहीं है। हमें एकजुट होकर आवाज उठाने की आवश्यकता है। जब तक मिलकर आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक समाज की प्रगति का नया रास्ता नहीं खुलेगा। आदिवासी समुदाय किसी भी अन्य समुदाय पर आश्रित  नहीं है। हमारा समुदाय सुरु से ही स्वाभिमानी समुदाय रहा है।आज हमारी एकता को कुछ हमारे ही लोग तोड़ने के प्रयास में लगे है।परन्तु वो यह नही सोच रहे है कि वे खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे है।आज जयस के साथ ओडिशा ,झारखण्ड,सहित पूरे राज्यो के आदिवासी जुड़ रहे है जयस एक विचारधारा है जो आदिवासीयो की 5वी अनुसूचि को धरातल पर लागू कराने हेतु संकल्पित है।।और हम हर हाल में हमारे उद्द्देष्य में सफल होंगे।

भाइयो आदिवासियों के कई  वर्षों से संचालित नियमों एवं परम्पराओं को ब्रिटिश शासनकाल में कानून के रूप मे मान्यता दी गयी। जिसे हम कस्टमरी लॉ के रूप में जानते हैं। भारत के आदिवासियों की मौखिक व्यवस्था के नियमों की व्याख्या बहुत ही विस्तृत है । आदिवासी कस्टमरी लॉ मे सिर्फ व्यक्ति, परिवार एवं गाँव की ही कल्पना नहीं की गई वरन  जल , जंगल , जीव , पर्यावरण और उसके परिवेश के साथ तालमेल की भी कल्पना की गई है जो की आदिवासी समुदाय और उसकी संस्कृति की पहचान के लिये एक सशक्त माध्यम रहा  है।हमारे इस अलिखित सम्विधान को भारतीय सम्विधान बनने के बाद अनुच्छेद 244(1)में 5वी अनुसूची का नाम दिया गया ।परन्तु सोचने वाली  बात है  की  आदिवासियों के हक मे बनाये गये 5वी अनुसूचि के प्रावधानों को  आजादी के 70 वर्षो बाद भी पूर्ण रूप से  लागू नही किया गया । क्या  हमारे दोनो सदन लोकसभा और राज्य सभा आदिवासियों के हित मे बने 5वी अनुसूचि के प्रावधानों से अनभिज्ञ है ? या जान बूझकर उनपर पर्दा डाला जा रहा है ।जबकि आज भी इसी प्रकार की व्यवस्थाओं द्वारा आदिवासी समाज  में ग्रामीण सामाजिक व्यवस्थाओं का संचालन किया जाता है लेकिन  सरकारे इस प्रकार की व्यवस्था को कोई मान्यता नहीं देती है  जबकि अनुसूचित क्षेत्रों मे इस प्रकार की व्यवस्था ही आदिवासियों की रूढिगत पारम्परिक व्यवस्था है।
भारत के 10 राज्य 5वी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं भारत के संविधान के अनुसार इन क्षेत्रों में सामान्य कानून व्यवस्था को लागू करने की इजाज़त नहीं देते। तो फिर किस आधार पर राज्य सरकारे  पंचायत चुनाव  करा रही है ? राज्य सरकारो द्वारा  इन अनुसूचित क्षेत्रों में  चुनाव करा कर यहां के परम्परागत प्रशासनिक व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है  इन अनुसूचित  क्षेत्रो में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव  कराने का क्या प्रयोजन है?जबकि सम्विधान अनुसार 5वी अनुसूचित क्षेत्रो में चुनाव अवैध है। जबकि 5 वी अनुसूची में सारी  शक्तिया पारम्परिक  ग्रामसभा को दि गई है। लेकिन पेसा कानून में 2008 में किये गए संशोधन ग्रामसभा की जगह ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 बना कर पारम्परिक ग्रामसभा की शाक्तियों को ही ख़त्म कर दिया गया है ।संविधान द्वारा बनाये गए कानून को अनुसूचित क्षेत्रों में पूर्णरूप से लागू किया जाएगा या फिर सरकारो का हस्तक्षेप इन क्षेत्रों में ऐसा ही होता रहेगा और आदिवासियों को उनके परम्परागत प्रशासनिक व्यवस्था से वंचित किया जाता रहेगा! भारत के सभी 10 राज्यों में लोक अधिसूचना जारी कर 5वी अनुसूची  को लागू किया चाहिए । देश का आदिवासी समुदाय अब अपने हक व अधिकार की लड़ाई के लिए उलगुलान करने को मजबूर है । क्योंकि 5वी अनुसूची का संबंध अनुसूचित क्षेत्रो की  परम्परागत प्रशासन व्यवस्था  सामाजिक और आदिवासियों की सांस्कृतिक ,जल जंगल जमीन व अस्तित्व से जुड़ा हुआ है।

भाइयो आज जिस तरह से जयस के साथ लोग जुड़ना चाह रहे है उससे स्पस्ट है कि आदिवासी कई सालो से पीड़ित है और वो अब चुप नही बैठ सकते।और हमारी यह लड़ाई संवेधानिक अधिकारों की लड़ाई है ।पूरे देश मे आजादी के 70 सालो से आदिवासी समुदाय के आंखों पर पट्टी बांधकर हाशिये पर रखा गया।और अब समुदाय में नए युवा उभरकर आ रहे है जो निश्चित ही आदिवासी समुदाय के लिए एक नई आशा की किरण है।जल जंगल जमीन की इस लड़ाई में हमे मजबूत इरादों के साथ मैदान में उतरना होगा।क्योंकि यह 70 सालो से सम्विधान को दबाकर रखने का मामला है और इसे बाहर निकालने के लिए हमे कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा।5वी अनुसूचि  से ही आदिवासी विकास सम्भव है।जब तक हमारा स्वशासन लागू नही किया जाता।तब तक हमारी जमीने ऐसी ही लूटी जाएंगी।हमारी मां बहनो की इज्जत सरेआम लूटी जाएगी हमारे निरपराध भाइयो को जबरन जेल में ठूस दिया जाएगा और गोली मार दी जाएगी।ऐसे कई उदाहरण आपको छतीसगड्ड व झारखण्ड में मिल जाएंगे।।भाइयो अब पानी सर से ऊपर जाने लगा है अब अगर नही जागे तो हमारे समुदाय का वजूद नष्ट हो जाएगा।मिशन 2018 के माध्यम से हमें आदिवासी ताकत दिखाने का एक सुनहरा अवसर डॉक्टर अलावा जी के प्रयासों व मेहनत से मिला है।हमे इसे हर हाल में खोना नही है।

राष्ट्रिय जनजाति आयोग के चेयर पर्सन नंदकुमार सहाय के साथ दिल्ली में संविधान की पाँचवी अनुसूचि और मिशन 2018 पर अपनी बात रखते हुये वीडियो में

 

मिशन 2018 में हमको एक

नया इतिहास रचाना है

उत्साह न अब गिरने पाए

राहों से न भटकने पायें

छेड़ें ऐसा उलगुलान  नया।

रुकना नहीं है अब हमको

लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ाना है

 मिशन 2018 में हमको एक

नया इतिहास रचाना है।

जो समझें हमको सिक्के खोटे

अब उनको हम दिखलायेंगे

चमकेगा हीरा हीरे  की तरह  अब

नकली आदिवासी दांतों तले ऊँगली दबायेंगे

करके पूरी मेहनत हमको

अपना नाम इतिहास में लिखाना  है

मिशन 2018 में हमको एक

नया इतिहास रचाना है।

गिरे बहुत हैं ठोकरों से

अब हमको नहीं गिरना है

कोई भी मुसीबत अब आये

हमको मंजूर भी भिड़ना है,

करके मजबूत इरादों को

हमें अपने लक्ष्य को पाना है

मिशन 2018  में हमको एक

नया इतिहास रचाना है।

अब मिशन 2018 के बाद  हमको

अपने पंखों से भी उड़ना है

कदम जमीं पर ही रख के

सीढ़ी सफलता की चढ़ना है,

आशायें आदिवासी  समुदाय  की हैं जो जयस से

उनको भी हमे  पूरा करना है

उम्मीद है जल जंगल जमीन   आदिवासीयो को

उन पर  भी खरा उतरना है,

आजादी हो आदिवासीयो के* *जीवन मेंहमें ऐसा स्वशासन  लाना  है

मिशन 2018  में हमको एक

नया इतिहास रचाना है।

ध्रुव चौहान,नेशनल जयस खिरकिया जिला हरदा

#Misshion_2018

सेवा जोहार भाइयो 

 ?आदिवासीयो  की भीड़ निकली  है सड़कों पे आज,

?अपना अधिकार  जानने, अपना अधिकार मांगने,

?हर उम्र के युवा  के आदिवासी है इसमें

?है शब्दों  में जोश भरा

70 सालो बाद जगे है ये

इतिहास के पन्नों में नया पन्ना जोड़ने

?आदिवासीयो की भीड़ निकली है सड़कों पे आज

?अपना अधिकार जानने, अपना अधिकार मांगने

?हो गई थी जुल्म कि इन्तहा

हाथ पांव जोड़कर,व  रोकर बहुत सह लिए,

और जल,जंगल,जमीन से भी हाथ धो बैठे।

?महिलाओं के स्तन व पुरुषों के सिने छलनी हो गए।

?सुनकर तो रुंह भी कपने लगे

परन्तु आज खड़े है सड़कों पे अन्याय को जड़ से उखाड़ने

?आदिवासीयो  की भीड़ निकली है सड़कों पे आज

?अपना अधिकार जानने, अपना अधिकार  मांगने

?बिगुल तो फूंक चुके है 5वी अनुसूची की  लड़ाई का

?अंजाम तक पहुचना अभी बाकी है

?मांग रहे है 5वी अनुसूची का हिसाब

?निकले है आदिवासी  आज अपना भविष्य सुधारने

?आदिवासीयो की  भीड़ निकली है सड़कों पे आज

?अपना अधिकार जानने, अपना अधिकार  मांगने।
नेशनल जयस

 

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