प्रेस की आज़ादी जनजातियों और दलितों के ख़िलाफ़ ही क्यूँ..?

प्रेस की आज़ादी जनजातियों और दलितों के ख़िलाफ़ ही क्यूँ..?

प्रेस की आज़ादी जनजातियों और दलितों के ख़िलाफ़ ही क्यूँ……?
हुकुमतों,भ्रष्टाचारियों,कालाबाज़ारियों,सफ़ेदपोशों,
बलात्कारियों,घोटालेबाज़ों के ख़िलाफ़ ये आज़ादी ग़ुलामी में क्यूँ बदल जाती है।

अख़बार आपका है,ख़बरदार आपका है,रसूखदार आपके है,
तथाकथित ठेकेदार आपके है….और विचार भी आपके ही है।

आपके विचारों का सम्मान है,ये अलग बात है की कुछ विचार वर्तमान मौसम में ठंड से ठिठुरते हाथों और काँपते होंठों की उपज है…ये कंपकपी बख़ूबी समझ आती है।सदियों के सवालों का जवाब मिलना शुरू हुआ…सदियों तक मंच आपका रहा,शेर और शायर भी आपके रहे,सत्तर सालों में दलितों और जनजातियों को उस मंच पर चढ़ने का अधिकार क्या मिला की ….”आप तो अर्ज़ है,अर्ज़ है करने लगे जनाब..!”
वृक्षों की छालों और पत्तियों को बदन पर धारण करने वालों के जिस्म पर कपड़ा आपको अखरता है,सदियों तक पारम्परिक तीर कमान धारण करने वालों के हाथ में कलम आपको अच्छी नही लगती,सदियों तक आपके जूतों की मरम्मत करने वालों के पाँवों में आपको चमचमाते जुते चिढ़ाते है,सदियों तक अंधेरों में रहने वालों के घरों में जलता हुआ आधुनिक दिया आपको नीचा दिखाता है….।ये सब बातें तभी सच का अमली जामा पहनती हुई नज़र आयेंगी जब जब दलितों और जनजातियों के मुख्यधारा में आने पर प्रश्न चिन्ह लगेंगे।संविधान प्रदत आधिकारों से सामाजिक स्थिति में बदलाव आया है,लेकिन आपकी मानसिकता आज भी ज्यों की त्यों है।जिस दिन ये मानसिकता दलितों और जनजातियों को सम्मान देने वाली हो जायेगी देख लेना आपके ज़ेहन में अतार्किक सवालों का ज्वार भी शांत हो जायेगा।दुनिया जिस प्रकृति को बचाने पर ग्लोबल प्रयास कर रही है उस प्रकृति को जनजातियाँ जन्म जन्मातर से पूजती आयी है,जिस पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के रोज़ अभियान चल रहे है,उस पर्यावरण की रक्षा जान देकर भी आदिवासियों द्वारा की गयी है।आप उन तर्कों के जवाब दे नही सकते हो,जिसके दम पर दलितों और आदिवासियों का दृष्टिक़ोंण हमेशा वैज्ञानिक रहा है।किताबों के लेखन से लेखक जरूर बना जा सकता है,लेकिन धरातल पर टिकने का साहस लेखक होने और विचार व्यक्त करने से कहीं अधिक मुश्किल होता है।आप हमेशा रंगमंच पर अभिनय के बादशाह रहे हो,वो रंगमंच जिस की बल्लियाँ और फंटे शोषितों द्वारा बाँधे गये,वो रंगमंच जिसके परदे के पीछे शोषितों को कामगारों के रूप में इस्तेमाल किया गया।परदे के पीछे रहकर भी आपकी भाव भंगिमाओं को पढ़ने का हुनर सिखा है…अब थोड़ा सा अभिनय शोषितों को भी करने दो,अवार्ड आपने जीते है कुछ दलितों और शोषितों को भी जीतने दो…अभी तो शुरुआत है,आपकी टॉरगेट करने वाली वैचारिकता को थोड़ा विराम दो…।
अपनी उपयोगिता का इस्तेमाल उस क्षेत्र में करो जिसके मापदंडो पर आपने शुरुआत की….
कितने बलात्कारी,भ्रष्टाचारी,कालाबाज़ारी,मिलावट खोर,सांप्रदायिकता के नाम पर फ़साद करने वाले स्वछंद घूम रहे है…कुछ आर्टिकल उनके नाम पर भी लिखो…जंगल में बड़े शिकारी होने हुनर रखते हो…लेकिन शिकार के नाम पर बंदूक़ तालाब से बाहर विचरण करते धीमी चाल से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहे कछुए पर तान रखी है,बहुत से सियार और गीदड़ भी इसी जंगल में है धोखा और धूर्तता जिनके स्वभाव में है उनको सबक़ सिखाओ..।

आप तो बेहद निपुण हो अपने कार्यक्षेत्र में,आपका सम्मान हम भी करते है…लेकिन ये-

“बारिशों का ख़ौफ़ दिखा कर,
मिट्टी की दीवारों को मत डराओ,
आप तो समंदर के मानिंद हो,
तैरते तिनकों से मत घबराओ।”

इस देश के वर्तमान तक आने में शोषितों और जनजातियों का भी योगदान रहा है,कभी आपकी कलम को इनकी वीरता और बलिदानी गाथा लिखना गँवारा नही हुआ।हाँ एक बात ज़रूर है आपके पास वो इरेजर ज़रूर था जिसने आपका पूरा साथ दिया और जो भी थोड़ा बहुत लिखा था उसकी सफ़ाई कर दी।थोड़ा मौक़ा मिला है एक अधिकार के रूप में उसे भुनाने दो…यही आपसे निवेदन है????। -शेखर मीणा

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