भारत के संविधान में ‘पांचवी अनुसूची’ अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण

भारत के संविधान में ‘पांचवी अनुसूची’ अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण

अनुसूचित क्षेत्र के ‘आदिवासी समाज’ शिक्षित होने के बाद भी अपने अधिकारों के प्रति अनिभिज्ञ है ! ‘Tribal Development’ तथा ‘Security ‘के लिए ‘भारत के संविधान में दर्जनों प्रावधानों के बावजूद इनका अपेक्षित लाभ इन्हें नहीं मिल रहा है। संविधान प्रदत्त अधिकारों की उपेक्षा लंबे अरसे से की जा रही है , लेकिन ‘आदिवासी समाज’ में जो ‘शिक्षित वर्ग’ संविधान के प्रावधानों की जानकारी रखता है , उनमे इच्छाशक्ति का इतना अभाव है की वे समय समय पर संविधान के उपेक्षा के कारण उत्पन्न होने वाले अनुकूल परिणामो को महसूस करते हुए भी समस्याओं की दिशा में कोई पहल नहीं करते। यह हमारी विडम्बना रही है – ” जो जानते है ! वे बोलते नहीं और जो बोलते है वो जानते नहीं”। आदिवासियों की दुर्दशा का शायद यही कारण हो सकता है ! शायद इसीलिए झारखण्ड राज्य बनने के बाद भी वहां के आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया है। आदिवासियों को अपने पूर्वजो का शत – शत नमन करना चाहिए , जिनके कठिन संघर्षो एवं दूरदृष्टि के कारण आज ‘आदिवासी समाज’ का अस्तित्व जीवित है। मैं समझता हूँ की झारखण्ड राज्य के गठन के बाद भी ‘ट्राइबल डेवलपमेंट’ का रोना हमारी अपनी गलती है। हमें इस गलती को स्वीकारना होगा। हमें इस बात को सोचना चाहिए कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन बना ? संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुपालन की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर उन आदिवासी राजनेताओं की थी, जिन्हें राज्य चलाने का जनादेश आम जनता ने दिया और सरकार की कुर्सी पर सम्मान के साथ बिठाया गया। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं होता की हमारे ट्राइबल्स नेताओं ने अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया। इसे जानबूझ कर अपनी उपेक्षा कहे या अज्ञानता। जिस संविधान को गढ़ने में संविधान निर्माताओं को करीब 185 वर्ष लगे हो , उनकी गंभीरता ऐसे ही समझ में आती है। इन 185 सालो में संविधान निर्माताओं ने दिन-रात मेहनत करके ट्राइबल समाज के सामाजिक , राजनितिक , आर्थिक एवं अस्मिता से जुड़े हुए पहलुओं को एकत्रित कर ट्राइबल्स के हित में संविधान निर्माण की जिम्मेदारी को पूरा किया। इसके बाद यदि संविधान का मकसद आजादी की 70 सालो में धूमिल हो जाए तो यह एक गंभीर समस्या है। इस पर चिंतन की आवश्यकता है।

भारतीय संविधान में ‘पांचवी अनुसूची’ के अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के अधिकार का कानून है। लेकिन विडम्बना यह है की इस कानून को पूर्णरूप से आज तक लागु नहीं किया गया ! भारत के नौ प्रांतो में कई अनुसूचित क्षेत्र है लेकिन आज भी वहां के आदिवासियों को अपने ही क्षेत्र में अपना ‘एडमिनिस्ट्रेसन ’ और ‘कंट्रोल’ प्राप्त नहीं है। भारत में शासन का नियंत्रण दो तरीके से होता है। पहला ‘लोकल इलेक्शन’ के उपरांत सांसद , पार्षद के माध्यम से और दूसरा ‘राष्ट्रपति’ के द्वारा। अनुसूचित क्षेत्र का नियंत्रण सिर्फ भारत के ‘राष्ट्रपति’ और भारत के ‘प्रांतीय राज्यपाल’ के द्वारा होता है। ‘अनुसूचित क्षेत्र’ (शेड्यूल फाइव एरिया) में इलेक्शन कराये जाने का कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि ‘पांचवी अनुसूची’ भारत के आदिवासी क्षेत्रो पारम्परिक ‘ग्रामसभा’ का अपना नियंत्रण और प्रशासन होता है। ‘पांचवी अनुसूची’ का कानून के अनुसार इस क्षेत्र में कोई भी किसी भी तरह का संसदीय चुनाव या पार्षद पद का कोई औचित्य ही नहीं है क्योंकि सारा नियंत्रण सिर्फ ‘ग्रामसभा’ के जरिए किया जाना था । लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों में असंवैधानिक तरीके से चुनाव कराकर अनुसूचित क्षेत्र के लोगो से नियंत्रण और प्रशासन उनके हाथो से छीन लिया गया। भारत के सभी राज्यों में राज्य से संबंधित संवैधानिक सामान्य कानून लागु है और वे सुचारु रूप से चल रहे है लेकिन ‘पांचवी अनुसूची’ अभी भी अधर पर लटका हुआ है, यही कारण है की इन क्षेत्रों में कई राजनितिक दल जोंक की तरह चिपक कर ‘अनुसूचित क्षेत्र’ के लोगो के अधिकारों को चूस रहा है ! लीडर बन कर सभी इतराते है लेकिन जब पांचवी अनुसूची की बात करो तो सबको साँप सूंघ जाते है ! जुबान पर ताला जड़ जाता है ! ऐसे नक्कारे लीडर की अब कोई आवश्यकता नहीं। ‘सिलेटसाफ’ नेताओं की अब कोई जरुरत नहीं। काम का ना काज का दुश्मन अनाज का ! कोई मंत्री या राजनेता अनुसूचित क्षेत्र के विषय पर बोलने से कतराते है। ‘पांचवी अनुसूची’ के संवैधानिक कानून के विषय में आज लोगो के बीच किसी राजनितिक दलो ने कभी जिक्र तक नहीं किया। जुबान मानो सील जाते है इनके ! ये क्यों बताएँगे ? इन्हें पता है की जिस दिन अनुसूचित क्षेत्र के लोगों को अपने निजी कानून और अधिकार के बारे में ज्ञान हो गयाउस दिन इन राजनीतिक दलो को यहाँ से बोरिया बिस्तर बांध कर भागना पड़ेगा। मैं तो कहता हूँ की ‘पाँचवी अनुसूची’ को आज ही लागु करे फिर देखिये कैसे इस प्रकार की समस्या का अंत होता है या नहीं ! संविधान की ‘पांचवी अनुसूची’ के प्रावधानों को पिछले 70 वर्षों में अमल में नहीं लाया गया। यह एक गंभीर मामला है।

‘पांचवी अनुसूची’ क्षेत्र में आदिवासियों के बीच नियंत्रण एवं प्रशासन के लिए ‘पि –पेसा’ या ‘पेसा कानून’ 1996 की धारा 4(0) के तहत ‘स्वायतशासी परिषद्’ का नियमावली राज्य सरकार को बनाना था , जो विधि सम्मत था लेकिन आजतक लागु नहीं किया गया। । आदिवासियों के कल्याण एवं उन्नति के लिए संविधान का अनुच्छेद 275 (1) के तहत ‘केंद्रीय कोष’ की व्यवस्था है पर आज सामान्य क्षेत्र का कानून लागू कर आदिवासियों को असीमित कोष से वंचित किया जा रहा है। आदिवासी इलाकों के शांति एवं सुशासन के लिए अपवादों एवं उपन्तारणों के अधीन रहते हुए ‘ग्राम सभा’ को सारे अधिकार दिया जाना था लेकिन पुलिस कानून, कोर्ट व्यवस्था, प्रखंड व्यवस्था आदि आज इसी व्यवस्था का बोलबाला है। भारत का संविधान आदिवासियों के बीच शांति और सुशासन देने की बात कहती है। यानि यह ‘सामान्य कानून व्यवस्था’ अनुसूचित क्षेत्र के लिए नहीं है। फिर भी आज हम इसी व्यवस्था से शासित हैं ! कितनी विडंवना है की यह हमारा देश भारत है और सभी आदिवासी राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ आंध्र प्रदेश, गुजरात ,हिमाचल प्रदेश ,मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र , ओडिसा ,राजस्थान जहाँ आदिवासियों की संख्या सघन है उन्हें उनके हक़ और संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया। है । दुःखद बात यह है कि पिछले 10 वर्षों में सरकार ने उद्योगपतियों को निमंत्रण देकर सरकारी खजानो से विज्ञापन तक दे रहे है, बुला रहे है हमारा झारखण्ड , हमारा छत्तीसगढ़ ,हमारा मध्यप्रदेश टाइटल होता है ‘ द अपोरच्युनिटी ऑफ़ लेंड ‘ कमाल है ! किसके लिए ? आदिवासियों के लिए या उद्योगपतियों के लिए ? संवैधानिक कानून का हनन कौन कर रहा है ? कहते है की देश का संविधान सर्वोपरि है फिर आज तक आदिवासी क्षेत्रो के कानून को 70 वर्षो से लंबित करने का क्या प्रयोजन है ?

अधिकांश उद्योग अनुसूचित क्षेत्रों में स्थापित होने वाले हैं एक लाख एकड़ से भी अधिक आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। अब प्रश्न ये उठता है की जब कोई भी ‘अनुसूचित क्षेत्र’ में जमीन अधिग्रहण नहीं कर सकता तो फिर कैसे किसी बाहरी व्यक्ति को जमीन मुहैया किया जा रहा है ? कौन लोग है जो इन उद्यमियों को जमीन बेच रहा है ? ‘ग्रामसभा’ के सहमति के बगैर कैसे कोई इन आदिवासियों की जमीन खरीद सकता है ? सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए की रैयती जमीन को ले जाने से आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। ‘पांचवी अनुसूची’ का कानून के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र में राजनितिक दलों एवं चुनाव का पूर्ण निषेध है। ‘पांचवी अनुसूची’ आदिवासियों के अस्तिव और जीवन को संरक्षित करने का एक मात्र उपाय है, और इसे जल्द से जल्द पूर्णरूप से इन क्षेत्रो में लागु किया जाना चाहिए।

  • राजू मुर्मू

संतालपरगना – झारखण्ड