जयपुर में हुआ बंजारा समाज का शानदार राष्ट्रीय सम्मेलन

जयपुर में राष्ट्रीय बंजारा सम्मेलन का समापन आज हो गया. यह आयोजन राजस्थान विश्वविद्यालय के देराश्री शिक्षक सदन में संपन्न हुआ. मुझे मुख्य अतिथि का सम्मान दिया गया.

मैं National Banjara Professors Organization का आभारी हूँ. अनेक महात्वपूर्ण मुद्दे सामने आये यथा:
• बकौल दलित लेखक सूरज बड़तिया दर्शन-चिंतन की परम्परा में आजीवक संप्रदाय के संस्थापक मक्खालि गौशाल बंजारा समुदाय से थे.
• हमारे प्रिय कवि लेखक प्रेमचंद गांधी की सूचनानुसार त्रिपिटक में बंजारों के सन्दर्भ मिलते हैं और राहुल सांकृत्यायन ने बंजारों का जिक्र किया है.
• भौगोलिक दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा दुर्ग बंजारों द्वारा निर्मित है जिसे लक्खीशाह बंजारा ने बनाया. इसके अवशेष हरियाणा के यमुना नगर जिला में मिले हैं. इतिहासकार सरदार गगनदीप सिंह के नेतृत्व में हरियाण सरकार की योजना के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण ग्रंथ का प्रकाशन हाल ही में हुआ है.

• बंजारों का निकास राजस्थान से माना जाता है. आर्य-अनार्य संग्राम श्रृंखला, पश्चातवर्ती बाहरी आक्रमणों, अकाल तथा अन्यथा रोजी रोटी की तलाश में इनका विस्थापन हुआ. आंध्र व तेलंगाना राज्यों में 32 लाख, कर्नाटक में 29 तथा महाराष्ट्र में 24 लाख बंजारा हैं. दूसरा धड़ा गया मध्यप्रदेश होता पंजाब जहाँ क्रमश: 22 और 20 लाख की संख्या में हैं. राजस्थान में रह गये उनकी जनसँख्या 23 लाख है. गुजरात, मध्यप्रदेश एवं उत्तरप्रदेश में भी इनकी जनसँख्या पायी जाती है.

• तेलंगाना व कर्नाटक में यह समाज काफी उन्नत दशा में है.

• मेरी जानकारी के अनुसार हिंदुस्तान की यह एक मात्र कौम है जिसके लोग कहीं भी चले गए हों, फिर भी अपनी सांस्कृतिक पहचान खासकर ‘गोरबोली’ भाषा को अभी भी संरक्षित किये हुए हैं.

• यूरोप का ‘रोमा’ समुदाय बंजारों से सम्बंधित हैं. उनका अंतर्राष्ट्रीय ध्वज है, जिसे सन 1933 में तैयार किया गया. सन 1971 में विश्व रोमानी कांग्रेस का आयोजन किया गया था तब उस झंडे को बाकायदा अंगीकार किया गया था.
• यूरोप एवं अमरीका में इनकी कुल जनसँख्या साठ लाख के आस पास बताई जाती है.
• बंजारा महापुरुषों में लक्खीशाह बंजारा के अतिरिक्त संत सेवालाल और गोविन्द गुरू का नाम काफ़ी विख्यात है जिन्होंने ब्रिटिश व सामंती गठजोड़ी फौजों से सन 1913 में टक्कर ली. उस संघर्ष में डेढ़ हजार आदिवासी शहीद हुए थे. ‘धूणी तपे तीर’ नामक मेरा उपन्यास इसी आदिवासी बलिदान पर केन्द्रित है.

लेखक हरिराम मीणा वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रह चुके हैं

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